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________________ -18अथ श्री संघपटक . wwwww खमां, साधुने एवा निवासनो,आश्रय करतापणे कहेलो प्रतिपादन करेखो माटे शास्त्रमा कहेलो ने गृहस्थोए नोगवेलो ए बे पदनो कर्मधारय समास करवो, कये प्रकारे कहेंलो ? तो साक्षात् प्रत्यक्ष, पोते कहेलो एटलो अर्थ बे, कोणे कहेलो तो तीर्थंकर तथा गौतमस्वामी आदि.गणधरोए कहेलो चकारनो समुच्चय अर्थ करवो. . टीका-तथाहि ॥ नगवान् श्रीमहावीरोवर्षाचतुर्मासकं तिष्टासुर्दूयमानपाखंझिनामाश्रमं गतस्तत्कुलपतिना लगवत् पितुवयस्येन सबहुमानमनुज्ञातस्तमुटजमध्युवासेत्यादि श्रूयते तथाचावश्यकचूर्णिः ॥ ताहे सामी वासावासे उवागएतं चैव दूतग गाम ए॥ तस्ये गमि उमए वासावासंठिओत्ति' तथा ॥ ताहे सामीरायगिहर्ड तत्थवाहिरिगाए तंतुवायसालाए । एगंदिसि अहापभिरूवंअवगहं अणुन्नवित्ता चिति ॥ अर्थः-परघर वासं तीर्थंकर महाराजे कों में ते कही देखामे .जे.लगवान श्रीमहावीर स्वामी वर्षाचोमासु रहेवा इच्छतासता, उंख पामता-पाखंमि तेमना आश्रममां गया त्यारे जगवानना पितानो मित्र कुलपति तेणे बहुमानपूर्वक अनुज्ञा करी त्यारे तेनी पर्ण शाळामां निवास कर्यों इत्यादि सांजळीए बीए. वळी आवश्यक चूर्णिमां कडं जे जे. . टीका:-तथाश्री सिंहगिरिसूरयोवैरमुनिवसतिपालं संस्थाव्य बहिः संज्ञाभूमि गता इतिचभ्रूयते॥ तथाहि ॥ अन्नयात्रा: ।
SR No.010774
Book TitleSanghpattak
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinvallabhsuri
PublisherJethalal Dalsukh Shravak
Publication Year1907
Total Pages703
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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