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________________ ८६३ व्याख्यानसार-प्रभसमाधान] विविध पत्र आदि संग्रह-३३वाँ वर्ष १२. नियागुं अर्थात् निदान. १३. आठ कर्म सब वेदनीय हैं, क्योंकि उन सबका वेदन किया जाता है; परन्तु उनका वेदन लोक-प्रसिद्ध न होनेसे, लोक-प्रसिद्ध वेदनीय कर्मको अलग गिना है। १४. कार्माण, तैजस, आहारक, वैक्रियक और औदारिक इन पाँच शरीरके परमाणु एक जैसे ही अर्थात् एक समान हैं; परन्तु वे आत्माके प्रयोगके अनुसार ही परिणमन करते हैं । १५. अमुक अमुक मास्तिष्ककी नसें दबानेसे क्रोध, हास्य, उन्मत्तता उत्पन्न होते हैं । शरीरमें मुख्य मुख्य स्थल जीभ, नाक इत्यादि प्रगट मालूम होते हैं, इससे उन्हें हम मानते हैं, परन्तु ऐसे सूक्ष्म स्थान प्रगट मालूम नहीं होते, इसलिये हम उन्हें नहीं मानते; परन्तु वे हैं ज़रूर। १६. वेदनीयकर्म निर्जरारूप है, परन्तु दवा इत्यादि उसमेंसे विभाग कर देती है । - १७. ज्ञानीने ऐसा कहा है कि आहार लेते हुए भी दुःख होता हो और छोड़ते हुए भी दुःख होता हो, तो वहाँ संलेखना करनी चाहिये । उसमें भी अपवाद होता है । ज्ञानियोंने कुछ आत्मघात करनेका उपदेश नहीं किया। १८. ज्ञानीने अनंत औषधियाँ अनंत गुणोंसे संयुक्त देखीं हैं; परन्तु कोई ऐसी औषधि देखनेमें नहीं आई जो मौतको दूर कर सके । वैद्य और औषधि ये केवल निमित्तरूप हैं। १९. बुद्धदेवको रोग, दरिद्रता, वृद्धावस्था और मौत इन चार बातोंके ऊपरसे वैराग्य उत्पन्न हुआ था। (१८) आषाढ वदी ५ भौम. १९५६ १. चक्रवतीको उपदेश किया जाय, तो वह एक घडीभरमें राज्यका त्याग कर दे। परन्तु भिक्षुकको अनंत तृष्णा होनेसे उस प्रकारका उपदेश उसे असर नहीं करता। २. यदि एक बार आत्मामें अंतवृत्ति स्पर्श कर जाय, तो वह अर्धपुद्गल-परावर्त्तनतक रहती है, ऐसा तीर्थंकर आदिने कहा है। अंतर्वृत्ति ज्ञानसे होती है। अंतर्वृत्ति होनेका आभास स्वयं ही (स्वभावसे ही) आत्मामें होता है; और वैसा होनेकी प्रतीति भी स्वाभाविक होती है। अर्थात् आत्मा थरमामीटरके समान है । अर होनेकी और उतर जानेकी जाँच थरमामीटर कराता है । यद्यपि थरमामीटर ज्वरकी आकृति नहीं बताता, फिर भी उससे उसकी जाँच होती है । उसी तरह अंतर्वृत्ति होनेकी आकृति मालूम नहीं होती, फिर भी अंतर्वृति हुई है ऐसी आत्माको जाँच हो जाती है। जैसे औषध ज्वरको किस तरह उतारती है, इस बातको वह नहीं बताती, फिर भी औषधसे ज्वर दूर हो जाता है—ऐसी जाँच होती है। इसी तरह अंतर्वृत्ति होनेकी स्वयं ही जाँच होती है । यह प्रतीति 'परिणामप्रतीति ' है। ३. वेदनीयकर्म + १. निर्जराका असंख्यातगुना उत्तरोत्तर क्रम है। जिसने सम्यक्दर्शन प्राप्त नहीं किया, ऐसे मिथ्यादृष्टि जीवकी अपेक्षा सम्यक्दृष्टि अनंतगुनी निर्जरा करता है। + लेखकका नोट वेदनीय कर्मकी उदयमान प्रकृतिमें आत्मा हर्ष धारण करती है, तो कैसे भावमें आत्माके भावित रहनेसे वैसा होता है ? इस विषयमें श्रीमद्ने अपनी आत्माको लेकर विचार करनेके लिये कहा।-अनुवादक.
SR No.010763
Book TitleShrimad Rajchandra Vachnamrut in Hindi
Original Sutra AuthorShrimad Rajchandra
Author
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year1938
Total Pages974
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, N000, & N001
File Size86 MB
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