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॥ श्रनमः सिद्धं ॥
|| ज्ञानानन्दरत्नाकर प्रारम्भः ॥
॥ शाखी ॥
परम पावन पथ नशावनद्द प्रभुका नाप जी । जो जपे ध्यावेवेद गावें ल शिव सुख धागजी || है सुक्ख दाता जगति त्राता हरै क्रोधरू कापजी । भन नाम बारम्बार सो जिन भक्त नाथूरामजी ॥
दौड़
प्रभु जपो नाम निशिदिन | मुक्तिनहीं होती है इस विन || जपामन वचन नाम जिनजिन पर पाया है तिनतिन || पापतज नाथूराम जिनभक्त | नाम जपने में रहो थानकजी ॥
को नाम सनाथ जाननिज युगलचरण का दासप्रभू । दीने मुक्ति रसाल काट विविज्ञान रखो निजपाम प्रभू || टेक || प्रथम नमों यादीश्वर को हुए यदि तीर्थ कतीर प्रभू । आदि जिनेश्वर आदीश्वर जी शिवरमणी भशीर प्रभु || अजितनाथजीने अजीतवसु दुष्टकर्म किए क्षारम्भु । तारण तरणजहाज नाथ किए भक्त भवोदधि पारम्भु || संभव नाथ गायगुण प्रगटे संभ्रम मैटतहार | ज्ञानभानु अज्ञान विपर हर तीन जगत में सारमभू || ।। चौपाई ॥
अभिनन्दन अभिमान त्रिदारो | मार्दवगुण सुहृदय विस्तारो || ज्ञान चक्र प्रभूजव करधारो | मोह मल्लरिपु क्षणमे मारो ॥ ॥ दोहा ॥
सुगति नाथ मधुमति पति, करो कुपति ममनाश। सुप्रति देहुनिज दास हो, अनुभव भानु प्रकाश || पद्ममभः के पद्मचरण हिरदे में करो ममवास प्रभु | दोर्जे करमाल काट विधिमाल रखो निजपास प्रभू ||१|| नाथ सुपार्श्व निजपारस
जन्म बनारस लीनाजी | सम्मोदागिरिवर वैध्यानधर वसुरिको क्षयकांना