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________________ (२१) 'पाठ स्वयं उचर लेना चाहिए। फिर " इच्छामि खमा० इच्छा० भगवन् वेठणं संदिसाहुं इच्छं " फिर " इच्छामि खमा० इच्छा० भगवन् वेठणे ठाऊ ? इच्छं" फिर "इच्छामि खमा० इच्छा० भावन् सन्झाय संदिसाहु ? इच्छं" फिर इच्छामि खमा० इच्छा० भगवन् सज्झाय करूं ? इच्छं" कहने के पश्चात् तीन नवकार पढ़कर दो घड़ी याने ४८ मिनिट तक धर्म ध्यान स्वाध्याय करना चाहिए। ॥अथ पंचिंदिअ॥ पंचिंदिअ संवरणो, तह नव विह यंभचेर गुत्तिधरो ॥ चउविह कसायमुक्को, इअ अट्ठारस गुणेहिं संजुत्तो ॥१॥ पंच महव्वय जुत्तो, पंचविहायारपालण समथ्थो ॥ पंच समिओ तिगुत्तो, छत्तीस गुणो गुरु मज्झ ॥२॥ इनके वाद खमासणा देना । अर्थ-शरीर, जिह्वा, नाक, आँख और कान इन पांच इन्द्रियोंके तेईस विषय उनके जो दो सो वावन विकार, उनको रोकना ये पांच गुण । तथा नव प्रकारसे शीलवतकी गुप्ति धारण करनी ये नौ गुण । क्रोध, मान, माया और लोभ इन चार कपायोंसे मुक्त होना ये चार गुण । इन उपरोक्त अठारह गुणोंसे १ पासमें चर्वला हो तो सामायिकमें खड़े होना और " करेमि भंते" का पाठ उच्चारण करना चाहिए, अन्यथा बैठे हुए ही सामायिक लेनी (उचरनी ) चाहिए । - -
SR No.010693
Book TitleChaityavandan Samayik
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAtmanandji Jain Pustak Pracharak Mandal
PublisherAtmanand Jain Pustak Pracharak Mandal
Publication Year1918
Total Pages35
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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