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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २१२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ववहारो य वियप्पो भेदो तह पजओत्ति एयहो। ववहारअवट्ठाणट्ठिदी हु ववहारकालो दु ॥ ५७१ ॥ व्यवहारश्च विकल्पो भेदस्तथा पर्याय इत्येकार्थः । व्यवहारावस्थानस्थितिर्हि व्यवहारकालस्तु ॥ ५७१ ॥ . अर्थ-व्यवहार विकल्प भेद पर्याय इन शब्दोंका एक ही अर्थ है । व्यंजनपर्यायके ठहरनेका जितना काल है उतने कालको व्यवहारकाल कहते हैं । अवरा पजायठिदी खणमेत्तं होदि तं च समओत्ति । दोण्हमणूणमदिक्कमकालपमाणं हवे सो दु ॥ ५७२ ॥ अवरा पर्यायस्थितिः क्षणमात्रं भवति सा च समय इति । द्वयोरण्वोरतिक्रमकालप्रमाणं भवेत् स तु ॥ ५७२ ॥ अर्थ-सम्पूर्ण द्रव्योंकी पर्यायकी जघन्य स्थिति एक क्षणमात्र होती है, इसीको समय भी कहते हैं। दो परमाणुओंके अतिक्रमण करनेके कालका जितना प्रमाण है उसको समय कहते हैं। भावार्थ-समीपमें स्थित दो परमाणुओंमें से मंद गमनरूप परिणत होकर जितने कालमें एक परमाणु दूसरी परमाणुका उल्लंघन करै उतने कालको एक समय कहते हैं । इतनी ही प्रत्येक पर्यायकी जघन्य स्थिति है। प्रकारान्तरसे समयका प्रमाण बताते हैं। णभएयपयेसत्थो परमाणु मंदगइपवटुंतो। बीयमणंतरखेत्तं जावदियं जादि तं समयकालो ॥१॥ नभएकप्रदेशस्थः परमाणुर्मन्दगतिप्रवर्तमानः । द्वितीयमनन्तरक्षेत्रं यावत् याति सः समयकालः ॥१॥ अर्थ-आकाशके एक प्रदेशपर स्थित एक परमाणु मन्दगतिके द्वारा गमन करके दूसरे अनन्तर प्रदेशपर जितने कालमें प्राप्त हो उतने कालको एक समय कहते हैं । प्रदेशका प्रमाण बताते हैं। जेत्तीवि खेत्तमेत्तं अणुणा रुद्धं खु गयणदवं च । तं च पदेस भणियं अवरावरकारणं जस्स ॥२॥ यावदपि क्षेत्रमात्रमणुना रुद्धं खलु गगनद्रव्यं च । ___स च प्रदेशो भणितः अपरपरकारणं यस्य ॥ २ ॥ अर्थ-जितने आकाशव्यमें पुद्गलका एक अविभागी परमाणु आजाय उतने क्षेत्रमात्रको एक प्रदेश कहते हैं । इस प्रदेशके निमित्तसे ही आगे पीछेका अथवा दूर समी१-२ ये दोनों ही गाथा क्षेपक हैं। For Private And Personal
SR No.010692
Book TitleGommatsara Jivakand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKhubchandra Jain
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year1916
Total Pages305
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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