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________________ चोविशी। २४३ श्रीअनिनंदन जिन स्तवन । अभिनंदन चंदन, शीतल वचन विलास । संवर सिद्धारथा, नंदन गुणमणि वास ॥ त्रणसें धनु प्रनु तनु, ऊपर अधिक पंचास । एक सहसश्युं दीदा, लिये बांकी नवपास ॥१॥कंचनवान सोहें, वानर लंबन स्वामी । पंचास लाख प्रव, आयु धरे शिवगामी ॥ वर नयरी अयोध्या, अनुजीनो अवतार | समेतशिखर गिरि, पाम्या जवनो पार ॥२॥त्रण लाख मुनीश्वर, तप जप संजम सार । षट लद बत्रीश, साध्वीनो परिवार । शासनसुर ईश्वर, संघनां विघन निवारें । काली दुख टाली, प्रजुसेवकने तारें ॥३॥ तुं नवनय नंजन, जन मन रंजन रूप । मनमथ गद गंजन, अंजन रति हित सरूप ॥ तुं भुवनें विरोचन, गतशोचन जग दीसे । तुज लोचन लीला, लहि सुख नित दीसे ॥ ४॥ तुं दोलतदायक, जगनायक जगबंधु । जिनवाणी साची, ते तरिया जवसिंधु ॥ तुं मुनि मन पंकज, चमर अमर नर राय । उन्ना तुज सेवें, बुध जन तुज जश गाय ॥५॥
SR No.010687
Book TitleAtmanand Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKarpurvijay
PublisherBabu Saremal Surana
Publication Year1917
Total Pages311
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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