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________________ ७६ में, प्राक्तन -विमर्ष - विचक्षण राव बहादुर मिस्टर आर. नरसिंहाचार एम. ए. लिखते हैं कि He (Nimba Samanta) is praised as the crest jewel of Samantas in the Ekatvasaptati of Padmnandi a deciple of Subhachandra who died in 1123. अर्थात् -- जिन शुभचन्द्रका ईसवी सन् ११२३ ( शक सं० १०४५ वि० सं० ११८० ) में देहान्त हुआ है उनके शिष्य पद्मनन्दिकी बनाई हुई 'निम्ब' सामन्तकी' सामन्त - चूडामणि ' के तौर पर प्रशंसा की गई है । इससे पद्मनंदिका उक्त उपासकाचार वि० सं० ११८० के करीबका बना हुआ मालूम होता है । उसके वाक्योंका उल्लेख करनेसे भी यह टीका विक्रम की १३ वीं शताब्दीकी बनी हुई सिद्ध होती है । विक्रमकी १३ वीं शताब्दी से "पहले के बने हुए किसी ग्रंथ में इसका उल्लेख मिलता भी नहीं । 1 इन सब प्रमाणोंसे यह बात बिलकुल स्पष्ट हो जाती है और इसमें कोई संदेह नहीं रहता कि यह टीका प्रमेयकमलमार्तंडादिके रचयिता प्रभाचंद्राचा'की बनाई हुई नहीं है और न हो सकती है । इसमें केवलीके कवलाहार विषयका कुछ कथन जरूर प्रमेयकमलमार्तंड और न्यायकुमुदचंद्रके आधार पर उनके कुछ वाक्योंको लेकर किया गया है और इसीसे विशेष कथन के लिये उन ग्रंथों को देखनेकी प्रेरणा की गई है । परन्तु उनके उल्लेखसे टीकाकारका यह आशय कदापि नहीं है कि वे ग्रंथ उसीके बनाये हुए हैं । --- भी बनाई हुई नहीं है गया है और जो १३ वीं जब कि यह टीका विक्रमकी १३ वीं शताब्दीकी - संभवतः इस शताब्दीके मध्यकालकी — बनी हुई पाई जाती है तब यह सहज ही में कहा जा सकता है कि यह टीका उन दूसरे प्रभाचंद्र नामके आचार्यों को जिनका उल्लेख ऊपर ६ से १० नम्बर तक किया शताब्दी से पहले के विद्वान् हैं । अब देखना चाहिये कि शेष ११ से १५ नम्बर तक विद्वानों में यह कौनसे प्रभाचंद्राचार्यकी बनाई हुई प्रतीत होती है । १४ वें नम्बर के रक्ताम्बर प्रभाचंद्रकी बनाई हुई तो यह प्रतीत नहीं होती; क्योंकि इसमें आचार भ्रष्टताको पुष्ट करनेवाली कोई खास बात नहीं देखी जाती । ११ वीं प्रतिमावाले उत्कृष्ट श्रावकके कथनमें, 'चेलखण्डधरः ' * पदकी व्याख्या करते हुए, यह तक भी नहीं लिखा कि वह वस्त्र ' रक्त' होना चाहिये, और जिसका * इस पदकी व्याख्यामें ' कोपीन मात्रवस्त्रखण्डधारकः आर्यलिंगधारीत्यर्थः ' इतना ही लिखा है । Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.010669
Book TitleRatnakarandaka Shravakachara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherManikchand Digambar Jain Granthamala Samiti
Publication Year1982
Total Pages456
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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