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शित, शुभचंदकी गुर्वावली* तथा मूल ( नंदी ) संघकी दूसरी पट्टावली में रत्नकीर्ति के पट्टशिष्य, शुभकीर्तिके प्रपट्टशिष्य और पद्मनन्दिके पट्टगुरु लिखा है, • और साथ ही निम्न पद्यके द्वारा यह भी सूचित किया है कि पूज्यपादके शास्त्रोंकी व्याख्या करने से आपकी कीर्ति लोकमें विख्यात हुई थी
पट्टे श्रीरत्न कीर्तेरनुपमतपसः पूज्यपादीयशास्त्र - व्याख्या- विख्यातकीर्तिर्गुणगणनिधिपः सत्क्रियाचारुचंचुः । श्रीमानानन्दधामा प्रतिबुधनुतमा मानसंदायिवादो 'जीयादाचन्द्रतारं नरपतिविदितः: श्रीप्रभाचन्द्रदेवः ॥
ये प्रभाचंद्र जिन ' शुभकीर्ति ' ( रत्नकीर्ति के पट्टगुरु 1 ) के पट्टशिष्य थे वे
वनवासी' आम्नायके थे, ऐसा उक्त गुर्वावलीसे मालूम होता है । श्रवण-: * जैनहितैषी, छठे भागके अंक ७-८ में जो ' गुर्वावली ' छपी है उसमें भी यह सब दिया हुआ I
गुर्वावलीमें पहले एक स्थान पर शुभकीर्तिको • धर्मचंद्र , का पट्टगुरु और रत्नकीर्तिका 'पगुरु' भी सूचित किया है; परंतु वह कुछ ठीक प्रतीत नहीं होता; क्योंकि उक्त धर्मचंद्रकी बाबत यह भी लिखा है कि वे ' हमीर भूपाल द्वारा पूजित थे, और हमीर ( हम्मीर ) का राज्यकाल वि० स० १३३८ या १३४२ से प्रारंभ होकर १३५८ तक पाया जाता है । ( देखो, भारतके प्राचीन राजवंश, प्रथमभाग । ) ऐसी हालत में प्रभाचंद्रका समय विक्रमकी १५ वीं शताब्दी हो जाता है, जो पट्टावलीके समयके विरुद्ध पड़ता है और उक्त शिलालेखके भी अनुकूल मालूम नहीं होता। क्योंकि शिलालेख में शुभकीर्तिके प्रशिष्य रूपसे जिन ' अमरकीर्ति ' आचार्यका उल्लेख है प्रभाचंद्र उनके प्रायः समकालीन विद्वान् होने चाहियें और शिलालेख में अमरकीर्तिकी भी दो तीन पीढ़ियोंका उल्लेख है । एक ' अमरकीर्ति' आचार्यने वि० सं० १२४७ में षट्कर्मोपदेश ' नामक प्राकृत ग्रंथकी रचना की है । यदि ये वही अमरकीर्ति हों जो शुभकीर्तिके प्रशिष्य थे तो इससे इन प्रभाचंद्रका समय और भी स्पष्ट हो जाता है। पट्टावलियों तथा गुर्वावलियोंमें, आचार्योंके नामोंका संग्रह करते हुए, नाम-साम्यके कारण कहीं कहीं पर कुछ गड़बड़ जरूर हुई है, और वह अच्छे अनुसंधानके द्वारा ही संलक्षित हो सकती है । परंतु इसके लिये गहरे अध्ययनके साथ साथ साधनसामग्रीकी सुलभताकी बड़ी जरूरत है. जिसकी ओर समाजका कुछ भी ध्यान नहीं है ।
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