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________________ दृष्टान्तोंकी जो कथाएँ दी हैं वे बहुत ही साधारण तथा श्रीहीन हैं, और कहीं कहीं पर तो अप्राकृतिक भी जान पड़ती हैं। उनमें भावोंका चित्रण बिलकुल नहीं, और इस लिये वे प्रायः निष्प्राण मालूम होती हैं । टीकाकारने, उन्हें देते हुए, इस बातका कुछ भी ध्यान रक्खा मालूम नहीं होता कि जिस व्रत, अव्रत अथवा गुण-दोषादिके विषयमें ये दृष्टान्त दिये गये हैं उनका वह स्वरूप उस कथाके पात्र में परिस्फुट (अच्छी तरहसे व्यक्त) कर दिया गया या नहीं जो इस ग्रंथ अथवा दूसरे प्रधान ग्रंथोंमें पाया जाता है, और उसके फलप्रदर्शनमें भी किसी असाधारण विशेषताका उल्लेख किया गया अथवा नहीं। अनंतमतीकी कथामें एक जगह भी निःकांक्षित' अंगके स्वरूपको और उसके विषयमें अनंतमतीकी भावनाको व्यक्त नहीं किया गया; प्रत्युत इसके अनंतमतीके ब्रह्मचर्य व्रतके माहात्म्यका ही यत्र तत्र कीर्तन किया गया है;'प्रभावना' अंगकी लम्बी कथामें 'प्रभावना' के स्वरूपको प्रदर्शित करना तो दूर रहा, यह भी नहीं बतलाया गया कि वज्रकुमारने कैसे रथ चलवाया-क्या अतिशय दिखलाया और उसके द्वारा क्योंकर और क्या प्रभावना जैनशासनकी हुई; धनदेवकी कथामें इस बातको बतलानेकी शायद जरूरत ही नहीं समझी गई कि धनदेवकी सत्यताको राजाने कैसे प्रमाणित किया, और बिना उसको सूचित किये वैसे ही राजासे उसके हकमें फैसला दिला दिया गया ! असत्यभाषणका दोष दिखलानेके लिये जो सत्यघोषकी कथा दी गई है उसमें उसे चोरीका ही अपराधी ठहराया है, जिससे यह दृष्टांत, असत्यभाषणका न रहकर दूसरे ग्रंथों की तरह चोरीका ही बन गया है । और इस तरहपर इन सभी कथाओंमें इतनी अधिक त्रुटियाँ पाई जाती हैं कि उनपर एक खासा विस्तृत निबंध लिखा जा सकता है। परंतु टीकाकार महाशय यदि इन दृष्टांतोंको अच्छी तरहसे खिला नहीं सके, उनके मार्मिक अंशोंका उल्लेख नहीं कर सके और न त्रुटियों को दूर करके उनकी कथा. ओंको प्रभावशालिनी ही बना सके हैं, तो यह सब उनका अपना दोष है। उसकी वजहसे मूल ग्रंथपर कोई आपत्ति नहीं की जा सकती। और न मूल आख्यान वैसे कुछ निःसार अथवा महत्त्वशून्य ही हो सकते जैसा कि टीकामें उन्हें बता दिया गया है । इसीसे हमारा यह कहना है कि इस ७ वीं आपत्तिमें कुछ भी बल नहीं है। ___छठी आपत्तिके सम्बंधमें यह कहा जा सकता है कि पद्यमें जिस 'जय' का उल्लेख है वह सुलोचनाके पतिसे भिन्न कोई दूसरा ही व्यक्ति होगा अथवा दूसरे Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.010669
Book TitleRatnakarandaka Shravakachara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherManikchand Digambar Jain Granthamala Samiti
Publication Year1982
Total Pages456
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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