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________________ 'अधुना प्रोषधोपवासस्तल्लक्षणं कुर्वन्नाह ।' अर्थात्-अब प्रोषधोपवासका लक्षण करते हुए कहते हैं। परंतु प्रोषधोपवासका लक्षण तो दो ही पद्य पहले किया और कहा जा चुका है, अब फिरसे उसका लक्षण करने तथा कहनेकी क्या जरूरत पैदा हुई, इसका कुछ भी स्पष्टीकरण अथवा समाधान टीकामें नहीं है। अस्तु; यदि यह कहा जाय कि इस पद्यमें 'प्रोषध' और 'उपवास'का अलग अलग स्वरूप दिया है-चार प्रकारके आहारत्यागको उपवास और एक बार भोजन करनेको 'प्रोषध' ठहराया है और इस तरह पर यह सूचित किया है कि प्रोषधपूर्वक-पहले दिन एकबार भोजन करके-जो अगले दिन उपवास किया जाता है-चार प्रकारके आहारका त्याग किया जाता है-उसे प्रोषधोपवास कहते हैं, तो इसके सम्बंधमें सिर्फ इतना ही निवेदन है कि प्रथम तो पद्यके पूर्वार्धमें भले ही उपवास और प्रोषधका अलग अलग स्वरूप दिया हो परंतु उसके उत्तरार्धसे यह ध्वनि नहीं निकलती कि उसमें प्रोषधपूर्वक उपवासका नाम प्रोषधोपवास बतलाया गया है। उसके शब्दोंसे सिर्फ इतना ही अर्थ निकलता है कि उपोषण (उपवास) पूर्वक जो आरंभाचरण किया जाता है उसे प्रोषधोपवास कहते हैं-बाकी धारणक और पारणकके दिनोंमें एकभुक्तिकी जो कल्पना टीकाकारने की है वह सब उसकी अतिरिक्त कल्पना मालूम होती है। इस लक्षणसे साधारण उपवास भी प्रोषधोपवास हो जाते हैं; और ऐसी हालतमें इस पद्यकी स्थिति और भी ज्यादा गड़बड़में पड़ जाती है । दूसरे, यदि यह मान भी लिया जाय कि, प्रोषधपूर्वक उपवासका नाम ही प्रोषधोपवास है और वही इस पद्यके द्वारा अभिहित है तो वह स्वामी समंतभद्रके उस पूर्वकथनके विरुद्ध पड़ता है जिसके द्वारा पर्वदिनोंमें उपवासका नाम प्रोषधोपवास सूचित किया गया है और इस तरह पर प्रोषधोपवासकी ‘प्रोषधे पर्वदिने उपवास प्रोषधोपवासः' यह निरुक्ति की गई है। प्रोषध शब्द 'पर्वपर्यायवाची' है और प्रोषधोपवासका अर्थ 'प्रोषधे उपवासः' है, यह बात श्रीपूज्यपाद, अकलंकदेव, विद्यानन्द, सोमदेव, आदि सभी प्रसिद्ध विद्वानोंके ग्रंथोंसे पाई जाती है जिसके दो एक उदाहरण नीचे दिये जाते हैं. "प्रोषध शब्दः पर्वपर्यायवाची । शब्दादिग्रहणं प्रतिनिवृत्तौस्सुक्यानि पंचा-. पीन्द्रियाण्युपेत्य तस्मिन्वसंतीत्युपवासः । चतुर्विधाहारपरित्याग इत्यर्थः । प्रोषधे उपवासः प्रोषधोपवासः ।" -सवार्थसिद्धिः। Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.010669
Book TitleRatnakarandaka Shravakachara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherManikchand Digambar Jain Granthamala Samiti
Publication Year1982
Total Pages456
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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