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________________ ५६ स्वामी समन्तभद्र | संस्मरीमि तोष्टवीमि नंनमीमि भारतीं, तंतनीमि पंपटीमि बंभणीमि तेमितां । देवराज नागराज मर्त्यराज पूजितां श्रीसमन्तभद्रवाद भासुरात्मगोचरां ॥ १ ॥ मातृ-मान-मेयसिद्धिवस्तुगोचरां स्तुवे, सप्तभंग सप्तनीतिगम्यतच्वगोचरां । मोक्षमार्ग-तद्विपक्षभूरिधर्मगोचरामाप्ततश्वगोचरां समन्तभद्रभारतीं ॥ २ ॥ सूरि सूक्तिवंदितामुपेयतत्त्वभाषिणीं, चारुकीर्ति भासुरामुपायतत्त्वसाधनीं । पूर्वपक्षखंडन प्रचण्डवाग्विलासिनीं संस्तुवे जगद्धितां समन्तभद्रभारतीं ॥ ३ ॥ पात्रकेसरिप्रभावसिद्धिकारिणीं स्तुवे, भाष्यकारपोषितामलंकृतां मुनीश्वरः । गृधपिच्छभाषितप्रकृष्टमंगलार्थिकां सिद्धि-सौख्यसाधनीं समन्तभद्रभारतीं ॥ ४ ॥ इन्द्रभूति भाषितप्रमेयजाल गोचरां, वर्द्धमानदेवबोधबुद्धचिद्विलासिनीं । यौगसौगतादिगर्वपर्वताशनिं स्तुवे क्षीरवार्धिसन्निभां समन्तभद्रभारतीं ॥ ५ ॥ मान-नीति- वाक्यसिद्धवस्तुधर्मगोचरां मानितप्रभावसिद्धसिद्धिसिद्धसाधनीं । Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.010669
Book TitleRatnakarandaka Shravakachara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherManikchand Digambar Jain Granthamala Samiti
Publication Year1982
Total Pages456
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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