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________________ स्वामी समन्तभद्र । इसके सिवाय चन्नरायपट्टण ताल्लुकेके कनड़ी शिलालेख नं० १४९ में, जो शक सं० १०४७ का लिखा हुआ है, समन्तभद्रकी बाबत यह उल्लेख मिलता है कि वे 'श्रुतकेवलि - संतानको उन्नत करनेवाले और • समस्त विद्याओंके निधि थे ।' यथा ४६ - श्रुतकेवलिगलु पलवरुम् अतीतर आद् इम्बलिके तत्सन्तानो – । नतियं समन्तभद्र व्रतिपर चलेन्दरु समस्तविद्यानिधिगल || और बेलूर ताल्लुकेके शिलालेख नं० १७ में भी, जो रामानुजाचार्य मंदिर के अहाते के अन्दर सौम्य नायकी- मंदिरकी छतके एक पत्थर " पर उत्कीर्ण है और जिसमें उसके उत्तीर्ण होनेका समय शक सं० १०५९ दिया है, ऐसा उल्लेख पाया जाता है कि श्रुतकेवलियों तथा और भी कुछ आचार्योंके बाद समन्तभद्रस्वामी श्रीवर्द्धमानस्वामी के तीर्थकी - जैनमार्ग की — सहस्रगुणी वृद्धि करते हुए उदयको प्राप्त --- हुए । यथा श्रीवर्द्धमानस्वामिगल तीर्थदोलु केवलिगल ऋद्धिप्राप्त रूं श्रुतिकेवलिगलं परं सिद्धसाध्यर् आगे तैत्.......त्यमं सहस्रगुणं माडि समन्तभद्र- स्वामिगल सन्दर्... | इन दोनों उल्लेखोंसे भी यही पाया जाता है कि स्वामी समन्तभद्र इस कलिकालमें जैनमार्गकी— स्याद्वादशासनकी— असाधारण उन्नति Jain Education International १, २ देखो ' एपिग्रेफिया कर्णाटिका' जिल्द पाँचवीं ( E. C., V. ) ३ इस अंशका लेविस राइसकृत अंग्रेजी अनुवाद इस प्रकार है- Increasing that doctrine a thousand fold Samantabhadra swami arose. For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.010669
Book TitleRatnakarandaka Shravakachara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherManikchand Digambar Jain Granthamala Samiti
Publication Year1982
Total Pages456
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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