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________________ गुणादिपरिचय । कोई मनुष्य अहंकारके वश होकर अथवा नासमझीके कारण कुछ विरोध खड़ा करता था तो उसे शीघ्र ही निरुत्तर हो जाना पड़ता था । इस तरह पर, समंतभद्र भारतके पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, उत्तर, प्रायः सभी देशोंमें, एक अप्रतिद्वंद्वी सिंहकी तरह क्रीडा करते हुए, निर्भयताके साथ वादके लिये घूमे हैं । एक बार आप घूमते हुए 'करहाटक' नगरमें भी पहुँचे थे, जिसे कुछ विद्वानोंने सतारा जिलेका आधुनिक 'कन्हाड या कराड़' और कुछने दक्षिणमहाराष्ट्रदेशका 'कोल्हा-.. पुर' नगर बतलाया है, और जो उस समय बहुतसे भटों ( वीर योद्धाओं ) से युक्त था, विद्याका उत्कट स्थान था और साथ ही अल्प विस्तारवाला अथवा जनाकीर्ण था । उस वक्त आपने वहाँके राजा पर अपने वादप्रयोजनको प्रकट करते हुए, उन्हें अपना तद्विषयक जो परिचय, एक पद्यमें, दिया था वह श्रवणबेल्गोलके उक्त ५४ वें शिलालेखमें निम्न प्रकारसे संग्रहीत है-- पूर्व पाटलिपुत्रमध्यनगरे मेरी मया ताडिता पश्चान्मालवसिन्धुठक्कविषये कांचीपुरे वैदिशे । प्राप्तोऽहं करहाटकं बहुभट विद्योत्कटं संकटं वादार्थी विचराम्यहं नरपते शार्दूलविक्रीडितं ॥ _१ देखो, मिस्टर एडवर्ड पी० राइस बी० ए० रचित 'हिस्टरी आफ कनडीज लिटरेचर 'पृ० २३ । २ देखो, मिस्टर बी. लेविस राइसकी 'इंस्क्रिप्शन्स ऐट श्रवणबेलगोल' नामकी पुस्तक, पृ० ४२; परंतु इस पुस्तकके द्वितीय संशोधित संस्करणमें, जिसे आर० नरसिंहाचारने तैय्यार किया है, शुद्धिपत्रद्वारा ' कोल्हापुर' के स्थानमें - 'कन्हाड' बनानेकी सूचना की गई है। ३ यह पद्य ब्रह्म नेमिदत्तके 'आराधनाकथाकोष' में भी पाया जाता है. परंतु यह ग्रंथ शिलालेखसे कई सौ वर्ष पीछेका बना हुआ है। Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.010669
Book TitleRatnakarandaka Shravakachara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherManikchand Digambar Jain Granthamala Samiti
Publication Year1982
Total Pages456
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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