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________________ श्री सिद्धचक्र विधान [१७९ देखन जानन भाव धरो हो, उत्तम लोक के हेतु गहे हो। साधु भये शिव साधन हारे, सो तुम साधु हरो अघ म्हारै॥ ____ॐ ह्रीं साधुलोकोत्तमज्ञानदर्शनाय नमः अयं ॥४३१॥ जाकर लोक शिखरपद धारा, उत्तम धर्म कहो जग सारा। साधु भये शिव साधन हारे, सो तुम साधु हरो अघ म्हारै॥ - ॐ ह्रीं साधुलोकोत्तमधर्माय नमः अर्घ्यं ॥४३२॥ धर्म स्वरूप निजातम माँही, उत्तम लोक विर्षे ठहराई। साधु भये शिव साधन हारे, सो तुम साधु हरो अघ म्हारै॥ ___ॐ ह्रीं साधुलोकोत्तमधर्मस्वरूपाय नमः अर्घ्यं ॥४३३॥ अन्य सहाय न चाहत जाको, उत्तम लोक कहै बल ताको। साधु भये शिव साधन हारे, सो तुम साधु हरो अघ म्हारै। ॐ ह्रीं साधुलोकोत्तमवीर्याय नमः अयं ॥४३४॥ उत्तम वीर्य संरूप निहारा, साधन मोक्ष कियो अनिवारा। साधु भये शिव साधन हारे, सो तुम साधु हरो अघ म्हारै॥ ____ॐ ह्रीं साधुलोकोत्तमवीर्यस्वरूपाय नमः अर्घ्यं ॥४३५॥ पूरणआत्मकला परकाशी, लोकवि अतिशयअविनाशी। साधु भये शिव साधन हारे, सो तुम साधु हरो अघ म्हारै॥ ____ॐ ह्रीं साधुलोकोत्तमअतिशयाय नमः अयं ॥४३६ ॥ राग विरोध न चेतन माही, ब्रह्म कहो जग उत्तम ताही। साधु भये शिव साधन हारे, सो तुम साधु हरो अघ म्हारै॥ ____ ॐ ह्रीं साधुलोकोत्तमब्रह्मज्ञानाय नमः अयं ॥४३७॥ ज्ञान सरूप अकम्प अडोला, पूरण ब्रह्म प्रकाश अटोला। साधु भये शिव साधन हारे, सो तुम साधु हरो अघ म्हारै॥ ॐ ह्रीं साधुलोकोत्तमब्रह्मज्ञानस्वरूपाय नमः अर्घ्यं ।।४३८॥
SR No.010544
Book TitleSiddha Chakra Mandal Vidhan Pooja
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSantlal Pandit
PublisherShailesh Dahyabhai Kapadia
Publication Year
Total Pages362
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual, & Vidhi
File Size17 MB
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