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________________ स्याद्वादमं. ॥ ७३ ॥ । तच्च न प्रमेयमपि तैरात्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गभेदाद्वादशविधमुक्तम् सम्यग् । यतः शरीरेन्द्रियबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषफलदुःखानामात्मन्येवान्तर्भावो युक्तः । संसारिण आत्मनः कथञ्चितदविष्वग्भूतत्वात् । आत्मा च प्रमेय एव न भवति । तस्य प्रमातृत्वात् । इन्द्रियवुद्धिमनसां तु करणत्वात् प्रमेयत्वाऽभावः। दोषास्तु रागद्वेषमोहास्ते च प्रवृत्तेर्न पृथग्भवितुमर्हन्ति । वाङ्मनः कायव्यापारस्य शुभाशुभफलस्य विंशतिविधस्य तन्मते प्रवृत्तिशब्दवाच्यत्वात् । रागादिदोषाणां च मनोव्यापारात्मकत्वात् । दुःखस्य शब्दादीनामिन्द्रियार्थानां च फल एवान्तर्भावः । " प्रवृत्तिदोषजनितं सुखदुःखात्मकं मुख्यं फलं तत्साधनं तु गौणम्।” इति जयन्तवचनात् । प्रेत्यभावापवर्गयोः पुनरात्मन एव परिणामान्तरापत्तिरूपत्वान्न पार्थक्यमात्मनः सकाशादुचितम् । तदेवं द्वादशविधं प्रमेयमिति वागूविस्तरमात्रम् । 'द्रव्यपर्यायात्मकं वस्तु प्रमेयम् ” इति तु समीचीनं लक्षणम् । सर्वसंग्राहकत्वात् । एवं संशयादीनामपि तत्त्वाभासत्वं प्रेक्षावद्भिरनुपेक्षणीयम् । अत्र तु प्रतीतत्वाद् ग्रन्थगौरवभयाच्च न प्रपञ्चितम् । न्यक्षेण ह्यत्र न्यायशास्त्रमवतारणीयम् । तच्चावतार्यमाणं पृथग्ग्रन्थान्तरतामवगाहत इत्यास्ताम् । 1 1 उन नैयायिकोंने प्रमेय ( प्रमाण करने योग्य जो पदार्थ ) है, उसको भी आत्मा १, शरीर, २, इन्द्रिय ३, अर्थ ४, बुद्धि ५, मन ६, प्रवृत्ति ७, दोप ८, प्रेत्यभाव ९, फल १०, दुःख ११ और अपवर्ग; इन भेदोंसे बारह २२ प्रकारका कहा है। और वह चारह प्रकार के प्रमेयका कथन करना उत्तम नही है । क्योंकि, शरीर २, इन्द्रिय २, बुद्धि ३, मन ४, प्रवृत्ति ५, दोष ६, फल ७, तथा दुःख ८, इन आठ भेदोंका तो आत्मामें ही अन्तर्भाव कर लेना ठीक है अर्थात् शरीरादि आठ प्रमेयों को तो आत्मारूप प्रमेयमें ही मिला लेने चाहियें । क्योंकि जो ससारी आत्मा है; वह किसी प्रकार ( अपेक्षा ) से इन शरीर आदिसे भिन्न नही है अर्थात् शरीरादिरूप ही है । और जो आत्मा है वह तो प्रमाता ( प्रमितिक्रियाका करनेवाला ) है अतः प्रमेय ही नहीं हो सकता है । इन्द्रिय, बुद्धि तथा मन ये तीनों तो करण है अर्थात् प्रमाता इनके द्वारा प्रमितिक्रियाको करता है अतः प्रमेय नही है | और दोष जो राग, द्वेष तथा मोहरूप है, वे प्रवृत्तिसे जुदे होने योग्य नहीं है । क्योंकि, उन नैयायिको के मतमें शुभ और अशुभफलको धारण करनेवाला ऐसा जो बीस २० प्रकारका मन, वचन, तथा काय, इन तीनोंका व्यापार है, रा. जै. शा ॥ ७३ ॥
SR No.010452
Book TitleRaichandra Jain Shastra Mala Syadwad Manjiri
Original Sutra AuthorN/A
AuthorParamshrut Prabhavak Mandal
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year1910
Total Pages443
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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