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________________ १२६ पुरातन-जैनवाक्य-सूची जो ण कुणाइ अवराहे ___ भावसं० ३०२ | जोण्हाणं णिरवेक्खं पवयणसा० ३-५१ जो ण कुपादि परतत्ति कत्ति० अणु० ४२३ जो तइलायहॅ भेउ जिणु जोगसा० २८ जो ए/ जापाइ जो ए जाणइ भावस० २३२ जो तच्चमणेयतं कत्ति० अणु० ३११ जो ण तरइ णियपावं भावसं० २५२ भावसं० ३५१ जो ण मरदि ग य दुहिदो समय० २५८ जो तसवहा उ विरदो पचसं० १-१३ जो प य कुवदि गव्व कत्ति० अणु० ३१३ जो तसवहा उ विरदो + गो० जी० ३१ जो रायपमाणरहिं तिलो० ५० १२ / जो तं दिहा तुट्टो पवयणमा० १-६२२०८(ज) जो ए/ य भक्खेदि सयं कत्ति० अगु० ३८० जो तिक्खदाढभीसण- धम्मर० ६८ जो गवकोडिविसुद्धं कत्ति० अणु० ३६० जो तिलोत्तम जो तिलोत्तम भावस० २९६ जो गवि जापाइ तच्च कत्ति० अणु० ३२४ जो दसभेय धम्म यत्ति० श्रणु० ४२१ जो पावि जागाइ अप्पु परु जोगमा० १६ एयगामं धम्मर० १०२ जो पवि जाणादि अप्पं कत्ति० अणु० ४६४ जो दंसणपभट्ट छेदपि० १६१ जो पवि जापदि एव पचयणसा० २-६१ | जोदिगणाणं संखा जबू०प० १२-१०२ जो पवि जारादि जुगव पचयणसा० १-४८ | जो (जं)टीहकालसवा- भ. श्रारा००७७ जो गवि बुज्झइ अप्पा पारा० सा० २१ जो दु अवग्गहणाणं जबू० ५० १३-६५ जो पविमएाइ जीउ समु परम० प० २-५५ जो दु अटुं च रुदं च मूला० १२६ जो पवि मण्पाइ जीव जिय परम०प०२-१०५ | जो दु अट्टं च रुदं च णियमसा. १08 जो ण विरदो हु भावो पचसं० १-१३४ जो दुगंछा भयं वेदं णियमसा. १३२ जो ण हवदि अण्णवसो णियमसा० १४१ जो दु ण करेदि कंखं समय० २३० जो ण हि मण्णइ एवं भावस०२७० जो दु धम्मं च सुकं च शियमसा० १३३ जो णाणहरो भन्यो श्रगप. ३-५४ जो दु पुण्ण च पावं च णियमसा० १३० जो णिक्खवणपवेसो भ० श्रारा० ४१५ जो दु हस्सं रई सोग णियमसा० १३१ जो णिच्चमेव मरणदि दव्वस० णय०४५ जो देओ होउणं भावस०२३३ जो णिज्जरेदि कम्म भ० श्रारा०२३४ जो देवमणुयतिरियउ छेदपि० ५३ जो णिय-करणहिं पचहिं वि परम० ५० १-४५ जो देहपालणपरो कत्ति० श्रणु० ४६७ जो णियछायाबिंवं रिदृस० ८२ | जो देहे हिरवेक्खो मोक्खपा० १२ जो णिय-दसण अहिमुहा परम० प० २-५६ | जो धम्मत्थो जीवो कत्ति० अणु० ४२० जो णिय-भाउ ण परिहरइ परम० प० १-१८ ! जो धम्म-सुकमाणम्हि णियमसा० १५१ जो णियमवंदणाणं छेदपि० ५५ जो धम्म ण करतो धम्मर०७ जोणि-लक्खई परिभमइ + परम० प०२-१२२ जो धम्म तु मुइत्ता समय० १२५ ते १० (ज) जो णिवसेदि मसाणे कत्ति० अणु० ४४७ जो धम्मिएसु मत्तो कत्ति० अणु० ४२० जो णिसिभुत्तिं वजदि कत्ति० अणु० ३८३ जो धवलावइ जिणभवणु सावय० दो० १६४ जो णिहदमोहगंठी. पवयणसा० २-१०३ | जोधेहिं कदे जुद्धे समय० १०६ जो णिहदमोहगंठी तिलो० प०६-५२ | जो पइँ जोइउँ जोइया पाहु० दो० १७६ पवयणसा०१-१२ | जो पइठावइ जिणवरहें सावय० दो० १६१ - जोणिहि लक्खहि परिभमइ + पाहु० दो० ८ | | जो पक्कमपक्कं वा पवयणमा०३-२६२ १६(ज) जोणी इदि इगवीसं तिलो० प०८-५ जो पक्खमासचउमास- छेदपि० १२० जोणी संखावत्ता तिलो. प०४-२६४८ / जो पढइ सुणइ गाहा सुदख०६४ जो णेव सच्चमोसोx पंचसं० १-१२ / जो पढइ सुगइ भावड भावसं०७०० जो णेव सच्चमोसो ४ गो० जी० २२० । जो परदव्वम्मि सुहं पंचयि० ११६
SR No.010449
Book TitlePuratan Jain Vakya Suchi 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1950
Total Pages519
LanguageHindi
ClassificationDictionary
File Size33 MB
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