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________________ १२५ आजन्म ब्रह्मचर्य की भीष्म प्रतिज्ञा कुमार वय के व्यतीत होने पर वंडी उमग से अगणित रमणीक भावनाओ को लेकर उस यौवन वय ने युवराज महावीर का सौ-सौ बार स्वागत किया जिसकी रम्य गोदी में बैठकर मनुष्य उन्मत्त हो उठता है, विषय वासनाएँ मानवोचित कर्त्तव्य से उसे दूर फेक देती है । काम का कठोर प्रहार उसे रमणियो का दास वना देता है, किन्तु विश्व विजेता वर्द्धमान को वह यौवन रचमान भी विचलित न कर सका। ससारी प्राणियो के बन्धन मोचन करने वाले वर्द्धमान के दया दिल को यौवन का प्रबल तूफान तनिक भी न हिला सका । जनता चकित थी कि युवराज मे यौवन और ब्रह्मचर्य का यह कैसा विषम सम्मेलन है किन्तु यह कौन जानता था ? कि क्षत्रिय युवराज ने नवयुग प्रवर्तन के लिए मन ही मन आजीवन ब्रह्मचर्य की भीष्म प्रतिज्ञा से अपने को आवद्ध कर लिया है। विचार-विमर्श राज्य-शासन के कार्यों मे महावीरश्री की न्यायप्रियता और कार्य क्षमता देखकर राजा सिद्धार्थ फूले न समाते थे। वे अपने पुत्र को कुल का भूषण और और न्याय का मूर्तिमान देवता समझते थे । सोचते थे महावीर अपना व अपने वशजो का नाम विश्व मे रोशन करेगे। ___ एक दिन राजा सिद्धार्थ ने अपनी भार्या त्रिशला देवी से कहा कि- "अपना शरीर अब वहुत ही जीर्ण-शीर्ण हो गया है, -ससार के माया-मोह और वर्द्धमान के वात्सल्य मे पडकर दिगम्वरी दीक्षा लेने से अभी तक वचित रहे जो कि अपने लौकिक हित और लोक मर्यादा की रक्षा और स्थिति की दष्टि
SR No.010408
Book TitleMahavira Chitra Shataka
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalkumar Shastri, Fulchand
PublisherBhikamsen Ratanlal Jain
Publication Year
Total Pages321
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
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