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________________ ज्ञानवाद और प्रमाणशास्त्र २४३ में I युगपद् होता है' । श्राचार्य कुन्दकुन्द ने स्पष्टरूप से इसका समर्थन किया है । वे कहते हैं - 'जिस प्रकार सूर्य में प्रकाश और ताप एक साथ रहते हैं उसी प्रकार केवली में दर्शन और ज्ञान एक साथ रहते हैं ।' सर्वार्थसिद्धिकार भी इसी सिद्धान्त का समर्थन करते हैं । वे कहते हैं'ज्ञान साकार है, दर्शन ग्रनाकार है । छद्मस्थ में वे क्रमशः होते हैं, केवली में युगपद् होते हैं।' इस प्रकार दिगम्बर परम्परा के सभी ग्राचार्यों ने केवलदर्शन और केवलज्ञान की उत्पत्ति युगपद् मानी । जहाँ तक छद्मस्थ के दर्शन और ज्ञान का प्रश्न है, श्वेताम्बर परम्परा और दिगम्बर परम्परा दोनों एकमत हैं । तीसरी परम्परा सिद्धसेन दिवाकर की है । वे कहते हैं कि मनःपर्यय तक तो ज्ञान और दर्शन का भेद सिद्ध कर सकते हैं, किन्तु केवलज्ञान और केवलदर्शन का भेद सिद्ध करना सम्भव नहीं । दर्शनावरण और ज्ञानावरण का युगपद् क्षय होता है । उस क्षय से होने वाले उपयोग में 'यह पहले होता है और यह बाद में होता है' इस प्रकार का भेद कैसे किया जा सकता है" । जिस समय कैवल्य की प्राप्ति होती है उस समय सर्व प्रथम मोहनीय का क्षय होता है, तदनन्तर ज्ञानावरण, दर्शनावरण और ग्रन्तराय का युगपद् क्षय होता है । जब दर्शनावरण भवति न युगपद् । सम्भिन्न... भवति । - तत्त्वार्थ सूत्रभाष्य १।३१ १ - मतिज्ञानादिषु चतुर्षु' पर्यायेणोपयोगो ज्ञानदर्शनस्य तु भगवतः केवलिनो युगपद्... २ -- जुगवं वट्टइ नारणं, केवलरणारिणस्स दंसरणं च तहा । दिरणयरपयासताप जह वट्टइ तह मुणेयव्वं ॥ - नियमसार, १५ε ३ - सर्वार्थसिद्धि २/६ ४ - मरणपज्जवरणारणंतो गारणस्स य दरिसरणस्स य विसेसो । केवलरणा पुरण दंसरणंति गाणं ति य समारणं ॥ ५ - वही २६ — सन्मतितर्क प्रकरण २१३ M
SR No.010321
Book TitleJain Darshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMohanlal Mehta
PublisherSanmati Gyan Pith Agra
Publication Year1959
Total Pages405
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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