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________________ (४८) जैन सुवोध गुटका। .nnnnnnnnnnnnnx MAANW नहीं छूटे। ज्ञानी तो हंस २ के चुकावे ।। ४ ।। चौथमल कहे कर्म मिटे सब, वीर प्रभु से जो ध्यान लगावे ॥ ५ ॥ ७१ प्रभु भजन प्रतिबोध. (तर्ज-ठुमरी) प्रभु के भजन पिन कैसे तिरोगे। सांच कह फिर सोच करोगे ॥टेर । अाठ पहर धंध लागो । सजन कुटुम्ब बीच नेह धरोगे ॥ प्रभु॥॥ १ ॥ मोह नशाके मांही छक के । बुरे कर्मों से नहीं डरोगे ॥ २ ॥ ज्वानी चली है झटपट । ज्यों नदियां को पूर उतरेगो ॥३॥ परभव में तेरो कोय न साथी । तेरो किमो फिर तुहीं भरेगो ।। ४ ।। चौथमल कहे सत् गुरु सीख सुन । सभी काज तेरो सुधरेगो ॥५॥ ७२ सत्य ही स्त्री का प्राभूषण, (तर्ज-बनजारा) सत्य धर्म धारोरी बहिना, क्या काम आवेगा गहना. ॥ टेर ॥ तेरे हार रेशमी सारी, सब लेगा तुरत उतारीजी । जब मुदित होगा नयना ।। सत्य०. ॥१॥ देह मूत्र मल मयी गंधी, मत बन काम में अंधीजी, है यौवन ज्यू जल फैना ॥२॥ कर-शोभा कंकण नाही, कर दान खुब हुलसाइजी, कर जीवां की तू जयणा ।। ३ ।। पर पुरुष समझ तू भाई, प्रिय वाक्य वद सुखदाईजी, चल कुल मर्यादा की एना ॥४॥ सुन नित्य शास्त्र की वाणी, जिससे सुधरेगा
SR No.010311
Book TitleJain Subodh Gutka
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChauthmal Maharaj
PublisherJainoday Pustak Prakashan Samiti Ratlam
Publication Year1934
Total Pages350
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
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