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________________ ४१० जैनसाहित्य और इतिहास २-० नेमिदत्तने श्रीपालचरित्रकी रचना वि० सं० १५८५ में की थी और वे मल्लिभूषणके शिष्य थे । आराधना-कथाकोशकी प्रशस्तिमें उन्होने मलिभूषणका गुरु रूपमें' उल्लेख किया है और साथ ही श्रुतसागरका भी जयकार कियों है, अर्थात् कथाकोशकी रचनाके समय श्रुतसागर मौजूद थे। ३-स्व० बाबा दुलीचन्दजीकी सं० १९५४ में लिखी गई ग्रन्थ-सूचीमें श्रुतसागरका समय वि . सं० १५५० लिखा हुआ है । __४-षट्प्राभृतटीकामें लोंकागच्छपर तीव्र आक्रमण किये गये हैं और कहा जाता है कि यह गच्छ वि० सं० १५३० के लगभग स्थापित हुआ था । अतएव उससे ये कुछ समय पीछे ही हुए होंगे। संभव है, ये लोकाशाहके समकालीन ही हो । ग्रन्थ-प्रशस्तियाँ (१) श्रीविद्यानन्दिगुरोर्बुद्धिगुरोः पादपंकजभ्रमरः । श्रीश्रुतसागर इति देशव्रती तिलकष्टीकतेस्मेदम् ॥ इति ब्रह्मश्रीश्रुतसागरकृता महाभिषेकटीका समाप्ता। संवत् १५८२ वर्षे चैत्रमासे शुक्लपक्षे पंचम्यां तिथौ रवौ श्रीआदिजिनचैत्यालये श्रीमूलसंघ सरस्वत गच्छे बलात्कारगणे श्रीकुन्दकुन्दाचार्यान्वये भट्टारकश्रीपद्मनन्दिदेवास्तत्पट्टे भट्टारक श्रीदेवेन्द्रकीर्तिदेवास्तत्पट्टे भट्टारकश्रीविद्यानन्दिदेवास्तत्पट्टे भट्टारकश्रीमालभूषणदेवास्तत्पट्टे भट्टारकश्रीलक्ष्मीचन्द्रदेवास्तेषां शिष्यवरब्रह्मश्रीज्ञानसागरपठनार्थे आर्या श्रीविमलश्री चेली भट्टारकश्रीलक्ष्मीचन्द्रदीक्षिता विनयश्रिया स्वयं लिखित्वा प्रदत्तं महाभिषेकभाष्यं । शुभं भवतु । कल्याणं भूयात् । श्रीरस्तु । -आशाधरकृतमहाभिषेककी टीका इति श्रीपद्मनन्दि-देवेन्द्रकीर्ति-विद्यानन्दि-मलिभूषणाम्नायेन भट्टारकश्रीमल्लिभूषणगुरुपरमामीष्टगुरुभ्रात्रा गुर्जरदेशसिंहासनभट्टारकश्रीलक्ष्मीचन्द्रकाभिमतेन मालवदेशभट्टारकश्रीसिंहनन्दिप्रार्थनया यतिश्रीसिद्धान्तसागरव्याख्याकृतिनिमित्तं नवनवतिमहा १ श्रीभट्टारकमालिभूषणगुरुर्भूयात्सता शर्मणे ।। ६९ २ जीयान्मे सूरिवों व्रतनिचयलसत्पुण्यपण्यः श्रुताब्धिः ॥ ७१ ३ स्व० सेठ माणिकचन्दजी जौहरीके भंडारकी प्रति ।
SR No.010293
Book TitleJain Sahitya aur Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherHindi Granthratna Karyalaya
Publication Year1942
Total Pages650
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size62 MB
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