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________________ भीलनी और नहीं कुछ धर्म पर, यह जन्म वृथा ही जाता है | क्या खबर कर्म कब छूटेगे, ये ही दुख मुझे सताता है । दोहा संक्षेप मे दिया बताय । अपना जो वृत्तान्त था, औदार चित्त प्रसन्त हो, यों बोले रघुराय ॥ दोहा ( राम ) ३०५ अब से नाम सुधर्मिका, तेरा गुण सम्पन्न | सार धर्म धारण किया, तेरा जन्म सुधन्य ॥ भक्ति ही संसार मे, करे भवोदधि पार । वह नवधा भक्ति तुम्हे, बतलाते है सार ॥ नवधा भक्ति ( श्री रामचन्द्र का भीलनी को उपदेश देना) चौपाई प्रथम साधु भक्ति सुखदानी | विनय सहित भक्ति मुख्य मानी ॥ सुविनय मूल धर्म का माना । यही मोक्ष का पन्थ बखाना । द्वितीय पढ़ो सर्वज्ञा की बानी । अथवा शास्त्र कथा सुनो कानी || सम्यग् ज्ञान दर्श चारित्र, इससे करो निज धर्म पवित्र । देवगुरु धर्मशास्त्र में प्रेम, निष्कपट भक्ति तृतीये शुभ नेम ॥ आश्रव रोक संवर को धारो, पुण्य ग्रहण कर पाप निवारो । उत्तम चौथी भक्ति पहिचानो, आत्म तुल्य सभी को जानो । शरणे, उत्तम चार बताये, इसमें पंच परमेष्ठी समाये । दृढ़ विश्वास रखो मन मांही, पचम भक्ति कही सुखदाई ॥ गृहस्थ धर्म वारह बतलाये, नित्य कर्म जिनके मन भाये । अतिथि संविभाग मुनि जन सेवा, अष्टम भक्ति आत्म सुख देवा ||
SR No.010290
Book TitleJain Ramayana Purvarddha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShuklchand Maharaj
PublisherBhimsen Shah
Publication Year
Total Pages449
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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