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________________ (५०६) हो, मूल उखेली ॥ मा० ॥ कुमति अकेली हो, दूरें मेली ॥ मा० ॥ ४ । तुं जिनराया हो, सुजस सवा या ॥ मा०॥ दिलमें आया हो, पाप गमाया ॥ मा०॥ वंबित पाया हो, विमल पसाया ॥ मा० ॥ गुण मन नाया हो, रामें गाया। मा० ॥ ५॥ इति ॥ ॥अथ मनिजिन स्तवन ॥ होरी खेलेंगे॥ए देशी॥ ॥ मन मोहन मनी नाथको, जस बोलेंगे ॥ शिव रमणीको रंग, धुंघट पट खोलेंगे। मोह्यो मन घन मोर ज्युं ॥ जस ॥ अब और न चाहुँ संग ॥ ७ ॥ ॥१॥ चिंतामणिकू पाश्कं ॥ ज० ॥ कुएग राचे काचे काच ॥ धुं० ॥ को चाहै खर केलिकू॥ ज० ॥ तजी सुर कुमरीको नाच ॥ पुं० ॥ ५ ॥ बाग्लकू सेवे नहीं ॥ ज० ॥ तजी मधुकर मालती फूल ॥ धुं० ॥ कोमल शय्या बोर के ॥ ज० ॥ कुण बैते धरिके शूल ॥ धुं० ॥३॥प्रनुको मूरति मेरे मन वसी ।। ज० ॥ सो तो विसरा विसरै न ॥ध्रु० ॥ दरसन प्रनु मुख देखकें ॥ ज० ॥ हम पावन कीने नैन ॥ धुं० ॥४॥ जनम कृतारथमें कस्यो ॥ ज० ॥ जब पायो ऐसो ईश ॥ धुं० ॥ विमल विजय नवद्यायको ॥ ज० ॥ एम राम कहे गुन शीश ॥ धुं० ॥ ५ ॥ ॥ अथ नेमिजिन स्तवनं ॥ राग जंगलो ॥ ॥संयम नेनंगी साथ, पिया में तो संयमलेगी। माय बाप मेरे काम न आवे, जूठो ए संसार ॥ पि या० ॥ १ ॥ तोरणसें रथ फेर चलायो, सुण पशु
SR No.010285
Book TitleJain Prabodh Pustak 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhimsinh Manek Shravak Mumbai
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year1889
Total Pages827
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size62 MB
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