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________________ ( १४१ ) सौरता जखमी वास जी ॥ ५० ॥ ते दिनकर करणी जोय जी ॥ ध० ॥ इम धर्मदायक तुं होय जी ॥ ध० ॥ ४ ॥ ते माटे धर्मना रागी जी ॥ ६० ॥ तुऊ पद सेवे बडनागी जी ॥ ध० ॥ कहे मान विजय नवजाय जी ॥ ध० । निज अनुभव ज्ञान पसाय जी ॥ ध० ॥ ५ ॥ ॥ इति ॥ १५ ॥ ॥ अथ श्री शांति जिन स्तवनं ॥ ॥ घरे आवो जी आंबो मोरियो ॥ ए देशी ॥ श्री शांति जिनेसर साहिबा, तुऊ नावे किम लूटाशे ॥ में लोधी केडज ताहरी, तेह प्रसन्न थये मूकाशे ॥ श्री० ॥ १ ॥ तूं वीतरागपणुं दाखवी, जोला जनने नूजावे ॥ जाणी में कीधी प्रतिगन्या, तेहथी कहो को ए मोजावे ॥ श्री ॥ २ ॥ कोइ कोइ ने केडें मत पडो, केडें पड्यां या वाज || नीरागी पण प्रभु खेंचीयो, नतें करने में सातराज ॥ श्री० ॥ ३ ॥ मनमांहि आणी वासियो, हवे किम निसरवा देवाय ॥ जो नेदरहित मुऊशुं मिले, तो पलकमांहि बूटाय ॥ श्री० ॥ ४ ॥ कबजे याव्या किम बूटशो, कीधा विप क हे कृपाल ॥ तोशुं हतवाद ले रह्या, कहे मान क रो खुशीयाल ॥ श्री० ॥ ५ ॥ ॥ इति ॥ १६ ॥ ॥ अथ श्री कुंथु जिन स्तवनं ॥ ॥ योगीसर चेला ॥ ए देशी ॥ कुंथु जिनेसर जाणजो रे, मुफ मननो अभिप्राय रे ॥ तुं यतम लवेसरु हो लाल, रखे तु जिनेसर ॥ विरहो थाय
SR No.010285
Book TitleJain Prabodh Pustak 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhimsinh Manek Shravak Mumbai
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year1889
Total Pages827
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size62 MB
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