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________________ २०) ( तृतीय भाग ज्ञान और अज्ञान ( मिथ्याज्ञान) मे और कोई भेद नहीं है सिवाय इसके कि ज्ञान सम्यग्दृष्टि को होता है और अज्ञान मिथ्याप्टि को । यह एक महत्त्वपूर्ण भेद है । जो अपने ज्ञान को सम्यग्ज्ञान बनाना चाहता है उसे आत्मा को पहचानना चाहिए- सम्यग्दर्शन प्राप्त करना चाहिए । इस प्रकार पाँच ज्ञान और तीन अज्ञान है। यह आठ भेद ज्ञानोपयोगी कहलाते हैं ।-- दर्शन के भेद पहले कहा जा चुका है कि दर्शन का अर्थ देखना भी है और सामान्य रूप से जानना भी है। यहाँ दर्शन का अर्थ सामान्य ज्ञान समझना चाहिए । दर्शन के चार भेद हैं -- मल अर्थ (१) चक्षुर्दर्शन-- आँख से जो सामान्य ज्ञान हो । (२) अचक्षुदर्शन-- आँख के सिवाय किसी भी दूसरी इन्द्रिय से अथवा मन से होने वाल सामान्य ज्ञान । (३) अवधिदर्शन- इन्द्रियो की महायता के विना स्वर आत्मा से ही रूपी पदार्थो के विशेष जान मे पहले होनेवाला सामान्यज्ञान (४) केवलदर्शन- केवल लब्धि में होने वाला समस्त पदार्थो का मामान्य बोध । उपयोग क्या है :-- ज्ञान, अनान और दर्गन मिलकर कुल बारह भेद हुए । इन नबो " उपयोग " कहते है।
SR No.010283
Book TitleJain Pathavali Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTrilokratna Sthanakwasi Jain Dharmik Pariksha Board Ahmednagar
PublisherTilokratna Sthanakwasi Jain Dharmik Pariksha Board Ahmednagar
Publication Year1964
Total Pages235
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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