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________________ सती. द्रौपदी (१) mom पति पाच पाकर भी पतिव्रत धर्म को धारण किया, तज भीस्ता जिसने सभा मे धर्म उच्चारण किया। - तेरह विताये वर्षे वन में कष्ट सह पति-संग में । साध्वी बनी फिर राज्य तज, ममता न रक्खी अग में। कपिलपुरी के राजा द्रुपद के दो सतान है-एक लडका ओर एक लडकी । लडके का नाम है धृष्टद्युम्न और लडकी का । नाम द्रौपदी । राजा लडकी को बहुत प्यार करता है । दौपद्री अब जवान हो गई है । उसके रूप का क्या कहना ! उसकी वाणी का क्या कहना । उमकी चतुरता भी गजब की है । कई जगह से दोपदी की मांग आई है, पर अच्छा पति खोज निकालने के अभिप्राय से राजा ने स्वयवर रचा है। स्वयवर मे देश-देश के राजा आये है । द्रपद राजा की गर्न है-'जो राधावेध करे वही द्रौपदी को वरे ।' सजा हुआ मडप है । वीचो-बीच एक रत्नो से जडा हुआ खभा खडा है। उसके दाहिनी मोर और बाई ओर चार-चार चक्र घूम रहे है । ऊपर ही ऊपर रत्नो की एक पुतली
SR No.010283
Book TitleJain Pathavali Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTrilokratna Sthanakwasi Jain Dharmik Pariksha Board Ahmednagar
PublisherTilokratna Sthanakwasi Jain Dharmik Pariksha Board Ahmednagar
Publication Year1964
Total Pages235
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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