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________________ केवली कुलभूषण और देशभूषण | २४३ महोत्सव किया। 'केवली कुलभूषण-देशभूषण की जय' के उद्घोषों से गगन गूंजने लगा। केवलियों को वन्दना करके श्रीराम ने अंजलि वाँध कर पूछा -प्रभो ! वह देव आप पर उपसर्ग क्यों कर रहा था ? . केवली कुलभूषण राम की जिज्ञासा शान्ति हेतु बताने लगे -राम ! इसके साथ हमारे पूर्व-जन्मों का सम्बन्ध है । पूरा वृतान्त सुनो । तुम्हारी जिज्ञासा शान्त हो जायेगी। पद्मिनी नाम की नगरी में विजयपर्वत नाम का राजा राज्य करता था। उसका एक दूत था-अमृतस्वर । अमृतस्वर की पत्नी उपयोगा थी और थे दो पुत्र उदित और मुदित । उपयोगा अपने पति के मित्र ब्राह्मण वसुभूति की ओर आकर्पित थी। वसुभूति भी उसे प्राणप्रण से चाहता था। उनके प्रेम सम्बन्ध में काँटा था-अमृतस्वर । उपयोगा और वसुभूति दोनों ही उसे मारकर कामभोग में लीन होना चाहते थे। एक दिन राजाज्ञा से अमृतस्वर को विदेश जाना पड़ा । साथ में मित्र वसूभूति भी चल दिया । मार्ग में छलपूर्वक उसने अमृतस्वर को ठिकाने लगाया और वापिस लौट आया। लोगों के पूछने पर कह दिया-'कार्यवश विदेश में रुक गया है।' ___ अमृतस्वर के घर आया वसुभूति तो उपयोगा ने आँखों के इशारे से पूछा-'क्या हुआ ?' वसुभूति ने बताया-काँटा सदा को निकल गया। प्रसन्न हो गई उपयोगा। किन्तु दूसरे ही क्षण वोली-काँटा तो निकल गया, मच्छर अभी बाकी हैं। . .-कौन मच्छर ? .
SR No.010267
Book TitleJain Kathamala
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Shreechand Surana
PublisherHajarimalmuni Smruti Granth Prakashan Samiti Byavar
Publication Year1977
Total Pages557
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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