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________________ भिपकर्म-सिद्धि लक्षण भी होते है । वमन की क्रिया में सामागय का दृश्य द्वार खुल जाता है और ग्रहणो द्वार उदर को पेशियो तथा महा प्राचीरा के दवाव से मंकुचित हो जाता है। इस प्रकार की गति का नामजस्य मस्तिष्क मतुगत वामक केन्द्र के नियन्त्रण द्वारा होता है । वामक योग तीन बडे वेगो में बांटे जा सकते है। (१) आमागय के लोभक तथा स्थानिक अथवा परावर्तित क्रिया से उत्पन्न वमन-आमाशय में स्थित प्राणदा नाड़ी ( vagus nerve ending) के अन्त पर क्षोभ पैदा करने वाले द्रव्यो ने उस प्रकार का वमन होता है । ये द्रव्य आमाशय के ग्रहणी हार पर पहुँचने के अनन्तर वमन का कार्य प्रारम्भ करते है अत इनकी क्रिया उत्तम तभी होती है जव इनके साथ बहुत बड़ी मात्रा में जल दिया जाय साथ ही आमागय का पीडन भी इन मोपधियो के साथ मावश्यक होता है । इस प्रकार की क्रिया से युक्त वमन द्रव्यो को आमागयिक वामक (Gastric Emetics) कहते है । इस प्रकार के क्षोभक द्रव्यो मे यगद के लवण ( Zinc sulphate), फिटकिरी, इपिकेकुवाना, नौसादर, तूतिया, इमली का अम्ल ( Tartaric acid ), सरसो, गरम जल, सेंधा नमक, नीम की पत्ती तथा विविध प्रकार के मामागय क्षोभक विपो का समावेश है। (२) केन्द्रीय वामक :-कुछ ऐसी भी मोपधियां है जिनका गोषण होने के अनन्तर वमन का प्रभाव देखा जाता है जैसे हृत्पत्री ( Digitalis ), अहिफेन, लोवेलिया ये द्रव्य केन्द्र को उत्तेजित करके वमन के लक्षण उत्पन्न करते हैं। आयुर्वेद ग्रंथो मे व्यवहृत होने वाले वामक द्रव्य अधिकतर आमागय मे लोभ पैदा करके अथवा परावर्तित क्रिया के द्वारा वमन पैदा करने वाले है। रेचन-क्रिया-आधुनिक दृष्टि से रेचन का कार्य बोपधियो के द्वारा चार प्रकार से होता है । अग्नेजी के रेचन गन्द के लिए कई पर्यायी शब्द व्यवहृत होते है। जैसे (Purgatives, Cathartics, Evacuants or Apirients) इनके कार्य निम्नलिखित प्रकार से होते है (१) न गोपण होने योग्य द्रव्यो का परिमाण वढा कर (२) जल का गोपण रोक कर (३) क्षुद्र और वृहद् अन्त्रो को क्षुभित करके यान्त्र गति को वढा कर (४) तथा मीचे नाडी मस्थान पर क्रिया करके । आन्त्र की गति वढ जाने से पानी मे पतले दस्त वैग से होने लगते है और पानी के गोपण कराने का मौका नहीं मिलता। वहुत-से चूर्ण केवल आन्त्र में अपने परिमाण के कारण आध्मान करके दस्त ले आते है। विरेचन के पूर्व आन्त्री का स्नेहन (Lubrication ) करने से रेचन बढिया होता है इसीलिए प्राचीनो ने रेचन के पूर्व स्वेदन का विधान किया है।
SR No.010173
Book TitleBhisshaka Karma Siddhi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRamnath Dwivedi
PublisherRamnath Dwivedi
Publication Year
Total Pages779
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size36 MB
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