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________________ ( ६३ ) भारी होता है जो नीचे गिर जावे, और न ऐसा हलका होता है जो आककी रुईकी तरह उड़ जावे । १ उपघात - इस नामकर्मके उदयसे ऐसे अंग होते हैं जिनसे अपना घात हो । १ परघात —— इस नामकर्मके उदयसे दूसरेका घात करनेवाळे अंगोपांग होते हैं । १ आताप - इस नामकर्मके उदयसे आतापरूप शरीर होता है । १ उद्योत - इस नामकर्मके उदयसे उद्योतरूप शरीर होता है । १ विहायोगति ( शुभ अशुभ ) - इस नामकर्मके उदयसे जीव आकाशमें गमन करता है । १ उच्छ्वास – इस नामकर्मके उदयसे जीव श्वास और उच्छ्वास लेता है । १ स - इस नामकर्मके उदयसे दो इंद्रिय आदि जीवोंमें जन्म होता है अर्थात् दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय, चार इंद्रिय, अथवा पाँच इंद्रिय होता है । स्थावर - इस नामकर्मके उदयसे पृथिवी, जल, अग्नि, वायु अथवा वनस्पतिमे अर्थात् एक इंद्रियमें जन्म होता है । १ वादर - यह वह नामकर्म है जिसके उदयसे दूसरेको रोकनेवाला और स्वयं दूसरेसे रुकनेवाला शरीर होता है । सूक्ष्म - यह वह नामकर्म है जिसके उदयसे ऐसा बारीक शरीर होता है जो न तो किसीसे रुक्ता और न किसी L
SR No.010158
Book TitleBalbodh Jain Dharm Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDayachand Goyaliya
PublisherDaya Sudhakar Karyalaya
Publication Year
Total Pages145
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size4 MB
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