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________________ ४२ ] प्राचीन जैन स्मारक । (४) विजयनगर या हम्पी - ता० होस्पेत तुंगभद्रा नदीपर एक बड़ा नगर था । इस नगरके ध्वंशस्थान ९ वर्गमील में हैं । इनको हम्पी ध्वंश स्थान कहते हैं। इस नगरको देवराजाने सन् १३३६ मैं बसाया था । यह इंग्लेंडके आठवें हेनरीके समकालीन थे । बहुतसे विदेशियोंने इस नगरका दर्शन किया था ( देखो Sewell's forgotten Empire ) कम्पलीको जो सड़क जाती है उसपर सबसे पहला ध्वंशस्थान गणि गित्ती (बुढ़िया) का जैन मंदिर मिलता है । इसके सामने जो दीपकका स्तंभ है उसपर जो लेख है उससे विदित होता है कि इस मंदिरको हरिहर द्वि० के राज्यमें जैन सेनापति इरुगप्पाने सन १३८५ में बनवाया था । यह राजा सब धर्मों पर माध्यस्थ भाव रखता था । इस शिलालेखकी नकल South Indian inscriptions Vol. I by Hultrych 1890 में दी हुई है । यह लेख २८ लाइनका संस्कृतमें है । इसका भावार्थ नीचे प्रकार है " मूलसंघ नंदिसंघ बलात्कारगण सरस्वती गच्छ आचार्य पद्मनंदि, उनके शिष्य धर्मभूषण भट्टारक उनके शिष्य अमरकीर्ति, उनके शिष्य सिंहनंदिगणमृत, उनके शिष्य धर्मभूषण म० द्वि० इनके शिष्य वर्द्धमान मुनि- उनके शिष्य धर्मभूषण भ० तु ० । इस समय वुक्कु महीपतिका पुत्र हरिहर द्वि० राज्य करता था तब उसके मंत्री दंडाधिपति चैत्र के पुत्र इरुगदंडेशने, जो मुनि सिंहनंदिका शिष्य था, शाका १३०७में बिजयनगरमें श्री कुंथुजिननाथका पाषाण मंदिर बनवाया । यह विजयनगर करनाटक देशके कुन्तल जिलेमें है ।
SR No.010131
Book TitleMadras aur Maisur Prant ke Prachin Jain Smarak
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMulchand Kishandas Kapadia
PublisherMulchand Kisandas Kapadia
Publication Year
Total Pages373
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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