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________________ करना चाहिए: शब्द पकड़कर नहीं बैठ जाना चाहिए। 24 शांतिदाय ऐशान दिशा प्रकृति-चक्र का प्रस्थान-बिदु है ऐशान । उसका प्रभावक तत्त्व है जल, जो शाति का प्रतीक है, इसीलिए ऐशान दिशा शातिदायक है। इस दिशा (विघ्नान्तक) नॉर्थ नॉर्थ-वेस्ट वायु कुबेर वायव्य उत्तर नॉर्थ-ईस्ट ईशान ऐशान (मोहान्तक) (पद्मान्तक) वरुण पश्चिम वेस्ट नैर्ऋत्य निर्ऋति दक्षिण आग्नेय साउथ-वेस्ट यम अग्नि साउथ साउथ-ईस्ट (प्रज्ञान्तक) दिशा-बोधक यंत्र का अधिष्ठाता है 'ईशान', जिसे शातिप्रदायक माना गया है। जैनदर्शन में 'तीर्थकर 37 शब्द भी शांतिप्रदायक' अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। धर्म-चक्र के इन प्रवर्तको का स्थान, देवालय, इसीलिए ऐशान दिशा में बनाया जाता ___ जल-ससाधन और उससे लगे हुए देवालय या पूजा-कक्ष के लिए ऐशान (उत्तर-पूर्व) का विधान है; क्योकि पूर्व से उदित होते सूर्य की किरणें जैन वास्तु-विण 28
SR No.010125
Book TitleJain Vastu Vidya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGopilal Amar
PublisherKundkund Bharti Trust
Publication Year1996
Total Pages131
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size4 MB
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