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________________ ( २६७ ) ससार मे ज्ञेय की महिमा प्रतिभासित होने से अपनी महिमा नहीं आती है । यदि अपनी महिमा आवे तो तत्काल धर्म की प्राप्ति होवे । प्र० २४ - पात्र मिथ्यादृष्टि को मिथ्यात्व अवस्था में कैसा भाव आता है ? उ०- (१) मै कौन हूँ? मै ज्ञान दर्जन उपयोगमयी जीव तत्व हू । (२) मेरे मे क्या है ? ज्ञान दर्शनादि अनन्त गुण है । (३) मेरा स्वरुप क्या है ? एक मात्र जानना देखना ही है । (४) यह चरित्र क्या बन रहा है ? उठना बैठना, खाना-पीना, व्यापारादि, विवाहादि यह सब पुद्गल के खेल है । उनमे मेरा स्वप्नपना भी नही है । ( ५ ) जो शुभाशुभ विकारी भाव हो रहे है इनका फल क्या होगा ? मात्र चारो गतियो का परिभ्रमण ही है । (६) मै दुखी हो रहा है ? दुख दूर करने का उपाय क्या है ? स्व-पर भेद विज्ञान | प्र० २५ - चर्चा करनी या नही ? उत्तर - ( १ ) पच परमेष्ठी की ही चर्चा करनी (२) अपनी चर्चा अपने पास ही करनी ( ३ ) किसी की चर्चा का विचार भी नही लाना । इस विषय मे किसी से पूछना भी नही । ( ४ ) दुनिया मे देखो सैकडो आये और चले गये । चक्रवर्ती मानुषोत्तर पर्वत पर अपना नाम लिखने जाता है लेकिन देखता है कि जगह ही नही । (५) अरे भाई - अपनी चैतन्य अरूपी असख्यात प्रदेशी की ही चर्चा करनी स्वय मे स्वयं से करती है । प्रवचन मे किसी के नाम की चर्चा नही आनी चाहिये । प्र० २६- आत्मा के खजाने का पता कैसे लगे ? उत्तर - जब शरीर को अलग जानेगा उसी समय अतीन्द्रिय आनन्द आवेगा । अनन्त काल का भव भ्रमण टल जायेगा । प्र० २७ - जिनवाणी का उपदेश क्या है ? उत्तर - हे विश्व के सज्ञी पचेन्द्रिय जीवो । तुम्हे इतना ज्ञान 1
SR No.010123
Book TitleJain Siddhant Pravesh Ratnamala 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Mumukshu Mandal Dehradun
PublisherDigambar Jain Mumukshu Mandal
Publication Year
Total Pages319
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
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