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________________ ( १६९ ) यथार्थ का नाम निश्चय कहा है। प्र० ५५-जीव के विकारी भावो को यथार्थ का नाम निश्चय क्यों कहा है? उत्तर-पयार्य मे दोष अपने अपराध से है । द्रव्यकर्म-नोकर्म के कारण नही है । इसका ज्ञान कराने के लिये विकारी भावो को यथार्थ का नाम निश्चय कहा है। प्र० ५६-निर्मल शुद्ध परिणति को उपचार का नाम व्यवहार क्यो कहा है ? उत्तर-अनादि अनन्त ना होने की अपेक्षा से तथा आश्रय करने योग्य ना होने की अपेक्षा से निर्मन शुद्ध परिणति को उपचार का नाम व्यवहार कहा है। प्र० ५७-भूमिका अनुसार शुभ भावो को उपचार का नाम व्यवहार क्यों कहा है ? उत्तर-मोक्ष मार्ग मे शुद्ध अश के साथ किस-किस प्रकार का राग होता है और किस-किस प्रकार का राग नहीं होता है। यह ज्ञान कराने के लिये भूमिका अनुसार शुभभावो को उपचार का नाम व्यवहार कहा है। प्र० ५८-द्रव्यकर्म नोकर्म को उपचार का नाम व्यवहार क्यों कहा है ? उत्तर-जब-जब पर्याय ने विभाव भाव उत्पन्न होते है, तब-तव द्रव्यकर्म-नोकर्म का निमित्त होता है-इस अपेक्षा द्रव्यकर्म-नोकर्म को उपचार का नाम व्यवहार कहा है। प्र० ५६-निश्चयनय किसे कहते है ? उत्तर-वस्तु के किसी असली (मूल) अंश को ग्रहण करने वाले ज्ञान को निश्चयनय कहते हैं । जैसे-मिट्टी के घड़े को मिट्टी का घड़ा कहना। । 5 fh- 15 p
SR No.010123
Book TitleJain Siddhant Pravesh Ratnamala 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Mumukshu Mandal Dehradun
PublisherDigambar Jain Mumukshu Mandal
Publication Year
Total Pages319
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
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