SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 355
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ इतिहासके प्रकागमे ३१६ दूषणयुक्त है । हिन्दुस्थानके अग काश्मीरमे परिभाषा नही जाती है, अतः वह अव्याप्त दूषण दूषित होनेके कारण धर्मकी दृष्टिसे जैन तथा वौद्धो को हिन्दू माननेके पक्षको प्रवल प्रमाणसे सिद्ध नही कर सकती है। ऐसी स्थितिमे जैनधर्मका स्वतन्त्र अस्तित्व अगीकार करना न्याय तथा सत्यकी मर्यादाके अनुकूल है । जैनधर्मका साहित्य मौलिक है । इसकी भाषा भी स्वतंत्र है। इसका कानून भी हिन्दू कानूनसे पृथक् है । ऐसी भिन्नताकी सामग्रीको ध्यान में न रख कोई-कोई इसे 'आर्यधर्मकी शाखा' बताने में अपनेको कृतार्थं मानते हैं | मद्रास हाईकोर्टके स्थानापन्न प्रधान विचारपति श्रीकुमारस्वामी शास्त्रीने हिन्दूधर्मावलम्वी होते हुए भी सत्यानुरोधसे यह लिखा है - " आधुनिक गोधने यह प्रमाणित कर दिया है कि जैनवर्म हिन्दूधर्मसे मतभिन्नता धारण करनेवाला उपभेद नहीं है। जैनधर्मका उद्भव एवं इतिहास उन स्मृतिशास्त्रो तथा उनकी टीकाओंसे बहुत प्राचीन है जो हिन्दू कानून और रिवाजके लिए प्रामाणिक मानी जाती है। यथार्थ बात तो यह है कि जैनधर्म हिन्दूधर्मके आधार स्तभ वेदोको प्रमाण नही मानता। यह उन अनेक क्रियाकाण्डोको अनावश्यक मानता है, जिन्हें हिन्दू लोग आवश्यक समझते है ।" १ “Were the matters res integra I would be inclined to hold that modern research has shown that Jains are not Hindu dissenters but that Jainism has an origin and history long anterior to the Smritis and commentaries, which are recognised authorities on Hindu law, usage... In fact Jainism rejects the authority of the Vedas, which form the bedrock of Hinduism and denies the efficacy of various ceremonies, which the Hindus consider essential." Sır Kumarswami Acting Chief Justice Madras H. Court AIR 1927, Madras 228.
SR No.010053
Book TitleJain Shasan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSumeruchand Diwakar Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1950
Total Pages517
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy