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________________ जैनगासन हा! यदि वे हिन्दी शब्दका प्रयोग करते तो पूर्ण सत्य कथन होता।" उनका यह कथन विशेष ध्यान देने योग्य है-“बुद्ध धर्म और जैनधर्म यथार्थमे हिन्दूधर्म नहीं है और न वे वैदिकधर्म ही है, यद्यपि इनकी उत्पत्ति भारतवर्षमे ही हुई और वे भारतीय जीवन सस्कृति तथा तत्वज्ञानके मुख्य अग है। भारतमे जो कोई वौद्ध अथवा जैन हो, वह भारतीय तत्त्वज्ञान और सस्कृतिकी शत प्रतिशत कृति है, किन्तु धर्मकी दृष्टिसे उनमेसे कोई भी हिन्दू नही है।" इस विवेचनसे यह स्पष्ट हो जाता है, कि जिस प्रकार पारसी, ईसाई, आदि धर्म वैदिकधर्म-जिसे हिन्दूधर्म कहा जाता है-से पृथक् है, उसी प्रकार जैन और बौद्ध भी परमार्थत. हिन्दूधर्म नही कहे जा सकते। सिंधु नदीसे सिंधु-समुद्र पर्यन्त जिसकी भूमिका है, वह हिन्दुस्थान है, और उसमे जिनके तीर्थस्थान है, अथवा जिनकी वह पितृ-भू है, उसे हिन्दू कहना चाहिए, ऐसी परिभाषा भी निराधार है एवं सदोष भी है। खोजा लोगोकी पुण्यभूमि भारत है। उनके धर्मगुरु आगाखान भारतीय है। अत: परिभाषाके अनुसार उनको हिन्दू कहना होगा, किन्तु यह प्रगट है, कि वे मुसलिमधर्मी होनेसे अहिन्दू माने जाते है। इसी प्रकार रोमन कैथलिक ईसाइयोके पूज्य गुरु सेण्ट जेवियरका निधन ववई प्रान्तके गोवामे हुआ था, अतः वह स्थल उनका तीर्थस्थान वन गया है, इससे परिभाषाकी दृष्टिसे उनकी परिगणना हिन्दुओमे होनी थी, न कि अहिन्दू ईसाइयोमें। ऐसा नहीं होता अत. परिभाषा अतिव्याप्ति "Buddhism and Jainism were certainly not Hinduism or even the Vedic Dharma, yet they arose in India and were integral parts of Indian life, culture and philosophy. A Buddhism or Jain in India is a hundred per cent product of Indian throught and culture yet. neither is a Hindu by faith”-ibid p. 73
SR No.010053
Book TitleJain Shasan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSumeruchand Diwakar Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1950
Total Pages517
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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