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________________ ७७ अंक २] जैनेन्द्र व्याकरण और आचार्य देवनन्दी । का नाम शब्दार्णव-प्रक्रिया ही होगा। हमें इसकी तीसरे पद्यमै भट्टारकशिरोमणि श्रुतकीर्ति देकोई हस्तलिखित प्रति नहीं मिल सकी । जिस वकी प्रशंसा करता हुआ कवि कहता है कि वे तरह अभयनन्दिकी वृत्ति के बाद उसीके आधारसे मेरे मनरूप मानससरोवरमै राजहंसके समान चिरप्रक्रियारूप पंचवस्तु टीका बनी है, उसी प्रकार काल तक विराजमान रहे । इसमें भी ग्रन्थकर्ता सोमदेवकी शब्दार्णव-चन्द्रिकाके बाद उसीके आपना नाम प्रकट नहीं करते हैं। परन्तु अनुमानसे आधारसे यह प्रक्रिया बनी है। प्रकाशकोंने इसके ऐसा जान पडता है कि ये श्रुतकीर्तिदेवके कोई कर्ताका नाम गुणनन्दि प्रकट किया है। परन्तु आन शिष्य होंगे और संभवतः उन श्रुतकीर्तिके नहीं पडता है इसके अन्तिम श्लोकोंमें गुणनन्दिका नाम जो पंचवस्तुके कर्ता हैं। ये श्रुतकीर्ति पंचवस्तुके देखकर ही भ्रमवश इसके कतीका नाम गुणनन्दि कर्ताले पृथक् जान पड़ते हैं । क्योंकि इन्हें प्रक्रिसमझ लिया गया है । घे श्लोक नीचे दिये याके कर्तीने 'कविपति ' बतलाया है, व्याकरण जाते हैं: नहीं । ये वे ही श्रुतकीर्ति मालूम होते हैं जिनका : सत्संधिं दधते.समासमभितः ख्याताधनामोनतं समय प्रो० पाठकने शक संवत १०४५ या वि० सं० . नितिं बहुतद्धितं कृतमिहाख्यातं यशःशालिनम् । १९८० बतलाया है । श्रवणयेल्गोलके जैनगुरुओंने सैपा श्रीगुणनन्दितानितवपुः शब्दार्णव निर्णयं . 'चारुकीर्ति पंडिताचार्य ' का पद शक संवत् नावत्याश्रयतां विविक्षुमनसां साक्षात्स्वयं प्रक्रिया ॥१॥ १०३९ के बाद धारण किया है और पहले 'चारदुरितमदेभनिशुंभकुम्भस्थलभेदनक्षमोमनखैः। कीर्ति इन्हीं श्रुतकीतिके पुत्र थे। अवणबेलगोलके राजन्मृगाधिराजो गुणनन्दी भुवि चिरं जीयात्।। २ १०८ वे शिलालेखमें इनका जिकर है और इनकी सन्मार्गे सकलसुखप्रियकरे संज्ञापित सहने बहुत ही प्रशंसा की गई है। लिखा हैप्रा(दि)ग्वासस्सुचरित्रवानमलकः कांतो विवेकी प्रियः । तत्र सर्वशरीरिरक्षाकृतमतिर्विजितेन्द्रियः। सोयं यः श्रुतकीर्तिदेवयतिपो भट्टारकोत्तसको सिद्धशासनवर्द्धन्प्रतिलव्धकीर्तिकलापकः ॥२२॥ रम्यान्मम मानसे कविपतिः सद्राजहंसश्विरम् ॥३ विश्रुतश्रुतकीर्तिभट्टारकयतिस्समजायत । इनमेसे पहले पद्यका आशय पहले लिखा जा प्रस्फुरद्वचनामृतांशुविनाशिताखिलहत्तमाः ॥२३॥ , चुका है। उससे यह स्पष्ट होता है कि गुणनन्दिके प्रक्रियाके कर्ताने इन्हें भट्टारकोत्तंस और शुलशब्दार्णवके लिए यह प्रक्रिया नावके समान है। कीर्तिदेवयतिप लिखा है और इस लेखमें भी भहा. और दूसरे पयमें कहा है कि सिंहके समान गुणन- रफयति लिखा है। अतः ये दोनों एक मालूम होते दि पृथ्वीपर सदा जयवन्त रहे । मालूम नहीं, हैं । आश्चर्य नहीं जो इनके पुत्र और शिप्य चारइन पयोंसे इस प्रक्रियाका फर्तृत्व गुणनन्दिको कीर्ति पण्डिताचार्य ही इस प्रक्रियाके कती हो। कैसे प्राप्त होता है । यदि इसके कर्ता स्वयं गुणन- समय-निर्णय। . न्वी होते तो घे स्वयं ही अपने लिए यह कैसे कहते :१) शाकटायन व्याकरण और उसकी अमोघवृ. कि वे गुणनन्दि सदा जयवन्त रहे । इनसे तो तिनामकी टीका दोनों ही के कर्ता शाकटायन नामसाफ प्रकट होता है कि गुणनन्दि ग्रन्थकर्तासे के आचार्य है, इस वातको प्रो. के. वी. पाठकने कोई पृथक ही व्यक्ति है जिसे वह श्रद्धास्पद सम- अनेक प्रमाण देकर सिद्ध किया है और उन्होंने झता है । अर्थात् यह निस्संदेह है कि इसके कत: यह भी बतलाया है कि अमोववृत्ति राष्ट्रकूट राजा गुणनन्दिके अतिरिक्त कोई दूसरे ही हैं। १ देखो 'सिस्टम्च आफ संस्कृत प्रामर' पृष्ठ ६७ ॥ १ छपी हुई प्रतिके अन्तमें " इति प्रक्रियावतारे २ देखो, मेरा लिखा 'कर्नाटक जैन कवि' पृष्ठ २० । ३ देखो, कृद्विधिः पाठः समाप्तः। समाप्तय प्रक्रिया ।" इस तरह जैनसिद्धान्तभास्कर, किरण २-३, पृष्ठ 100 छपा है । इससे भी इसका नाम जैनेन्द्र प्रक्रिया नहीं ४ देखो, इंडियन एण्टिक्वेरी, जिल्द ४३, पृष्ठ २.५-१२ जान पमन्त्रा। में प्रो० पाठकका लेख।
SR No.010004
Book TitleJain Sahitya Sanshodhak Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinvijay
PublisherJain Sahitya Sanshodhak Samaj Puna
Publication Year
Total Pages137
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Articles
File Size11 MB
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