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________________ जैन साहित्य संशोधक [खंड २ ४. अंतमा, आपणे वर्धमान अने अवन्तीपति चण्डप्रद्योत ए बनेना अवसाननी समकालीनता बतावनारी परंपराना संबंधमां विचार करीए. अहींआं पण आपणे आ समकालीनताने अक्षरशः न लई शकीए छतां पण एटलुं तो स्वीकारी शकाय के आ महात्मा तथा राजा बने लगभग सरखा समये देहांत पाम्या हशे. भासना वासवदत्तामां जे एक परंपरा आवेली छे तदनुसार चण्डप्रद्योतनुं मरण मगधना दर्शकना राज्यना प्रारंभमां (४३७-४१३ इ. स. पूर्वे ) थयु होवू जोईए. कारण एम छे के, भासे, प्रद्योत पासे तेना पुत्रने माटे दर्शकनी बहेननुं मागुं करावेलुं छे. आ नाटकना पोताना जर्मन अनुवादमां प्रो. जेकोबी एवो मत धरावे छे के आ प्रद्योत "प्रायः महासेननो पुत्र छे." परंतु मारी पासे स्पष्ट पुरावा छे के ते महासेननो पुत्र नहि पण खुद महासेन ज हतो. बीजा अंकमां भासे जणावेलुं छे के “प्रद्योत जे महासेन कहेवाय छेतेनुं कारण तेनी मोटी सेना छे."26 छटा अंकमां प्रद्योतनी राणी उदयनने कहे' "तुं अमारा पुत्र गोपाल बालकना जेटलो वहालो अमारो जमाई थयो छु.” 27 बौद्धग्रंथो द्वारा आपणे जाणीए छीए के उदयने चंडप्रद्योतनी पुत्रीनहरण करी तेनुं पाणिग्रहण कर्यु हतुं. ___हवे मात्र एटलुंज बताववानुं रघु छ के-भासनी आ कथा एक प्राचीन अने विश्वासपात्र परंपराने आधारे रचाएली छे. ते कथानी अंदर लावाण्यकर्नु दहन अने प्रद्योतनी पुत्रीन कल्पित मरण ए एक मख्य सांकळ छे अने आ बाबतमां आ कथाने बौद्ध दिव्यावदान 28 द्वारा पुष्टि मळे. भासे प्रद्योतने जे महासेननो बिरुद आपेलो छे तेने बाणना कथन- पण समर्थन मळे छे. कारण के बाणे पण हर्षचरित्रमां29 ते राजाने ते ज उपनाम आपेलुं छे गोपालपालक ए नाम विष्णुपुराणमां पण मळी आवे छे. परंतु अन्य पुराणो अने जैन मेरुतुंग तेनुं नाम फक्त पालक एटलं ज आपे छे, अने आ नाम ते घणुं करीने तेना पूर्ण नामनुं एक रूपान्तरित संक्षिप्त नाम छे. भासे आ रीते स्पष्ट रूपे एक प्राचीन परंपरानो उपयोग करेलो होवाथी आपणे तेनी कथाने स्वीकारीए के चंडप्रद्योत दर्शकना राज्याधिरोहण पछी पण हयाती धरावतो हतो. आ कथन जो खरं होय तो तेनुं अने वर्धमाननुं अवसान इ. स. पूर्वे लगभग ४३७ वर्षनी पहेलां होई शके नहि. आरीते इ. स. पर्वेनं ४३९ में वर्ष अगर तो अनन्दविक्रमनं ४७० मं वर्ष ते जैन कालगणनाविषयक प्राचीन परंपराओने पूर्ण करतुं जणाय छे. तेमज आ हिंदु, बौद्ध अने जैन पुरावाओना आधारे ए युगना सामान्य इतिहासना संबंधमां जे जाणीए छीए तेनी साथे पण बंधबेसतुं थाय छे. . 26. त्रिवेन्दम् संस्कृत ग्रन्थावलीमां मुद्रित पृ० २० 27. तेज पुस्तक. पृ० ६९. 28. जुओ, अवदान ३६. 29. हर्षचरित्र उच्छ्वास, ६, पृ २२१ ( In the Bombay edition of the Text.) Aho! Shrutgyanam
SR No.009879
Book TitleJain Sahitya Sanshodhak Khand 02 Ank 01 to 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinvijay
PublisherJain Sahitya Sanshodhak Samaj Puna
Publication Year1923
Total Pages282
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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