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________________ ॥श्रीअर्जुनपताका ॥ अंइत्यस्यर होऽत्यागा देकादशततो निमा । रेफेद्वौहे कृत ४ मिता-स्तद्वोगे षट् निवेशिताः ॥ ११ ॥ फेस्य व्यंजनवे नै-कोनत्वे पंचवा स्थिताः। अहं पदादिशयंत्रं । मेघादि विजयोदितं ॥१२॥ तथा अं[अंई मांनो अं] र ७ तथा हु-४ ने नहिं छोडीनो रह्यां छे माटे ते [१४= १११ नो अंक अग्रे [ अटले ३ नी] पश्चात् स्थापवो. तथा रेफनो २ अने ह् नो ४ धृवांक छे, ते बे मळीने ६ थाय माटे ६ नं। अंक अगिआरनी पश्चात् स्थापवो. वळी रेफ जे व्यंजन छे, माटे अक न्यून करवाथी ५ नो अंक आवे छे, माटे ते पण ६ नी साथे स्थापवो ओ प्रमाणे श्रीमेघविजयजी उपाध्याये कहेलो २० नो यंत्र अंहं पदथी सिद्ध कर्यो. ॥ इति अंहं पदेन विंशति यंत्रम् ॥ ११ ॥ १२ ॥ ॥ इत्यहँ पदेन विशयंत्र व्यवस्था ॥ . १ एकादयःस्यु नव यावदंकाः । यंत्रे यतः पंच दश प्रसिद्धे ।। द्वाद्या दशांता धृति यंत्रकेऽकाः । व्यक्तोऽधिके स्माद्गाणतेर्थ भेदः ॥१३॥ धारक नाम ॥ अथ विंशतियंत्रे ३ तः ११ अंकहेतुः ॥ अर्थः-जे कारणथी १५ ना अंकथी प्रसिद्ध अवा यंत्रमा ( पंदरीया यंत्रमा) १ थी प्रारंभीने ९ सुधीना अंक होय छे, अने धृति=१८ ना यंत्रमा बेथी दश सुधीना नव अंक होय छे ते पंदरियाथी अधिक अंक होवाथी जे गणितनो अर्थ भेद युक्त छे ॥ १३ ॥ Aho I Shrutgyanam
SR No.009872
Book TitleAnubhutsiddh Visa Yantra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMeghvijay
PublisherMahavir Granthmala
Publication Year1937
Total Pages150
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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