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________________ २०६ आगमसूत्र - हिन्दी अनुवाद वो निर्मलता निष्कलुषता से विशुद्ध होते है इस कारण से ऐसे कहा जाता है कि एक निःशल्य आशयवाला शुद्ध होता है और शल्यवाला शुद्ध नहीं हो शकता । [ ४०६ -४०७] हे गौतम ! यह स्त्री, पुरुष के लिए सर्व पाप कर्म की सर्व अधर्म की धनवृष्टि समान वसुधारा समान है मोह और कर्मरज के कीचड़ की खान समान सद्गति के मार्ग की अर्गला - विघ्न करनेवाली, नरक में उतरने के लिए सीड़ी समान, बिना भूमि के विषवेलड़ी, अग्नि रहित उंबाडक- भोजन बिना विसूचिकांत बिमारी समान, नाम रहित व्याधि, चेतना बिना मूर्छा, उपसर्ग बिना मरकी, बेड़ी बिना कैद, रस्सी बिना फाँसी, कारण बिना मौत या अकस्मात मौत, बताई हुई सर्व उपमा स्त्री को लग शकती है । इस तरह के बदसूरत उपनामवाली स्त्री के साथ पुरुष को मन से भी उसके भोग की फिक्र न करना, ऐसा अध्यावसाय न करना, प्रार्थना, धारणा, विकल्प या संकल्प अभिलाषा स्मरण त्रिविध त्रिविध से न करना । गौतम ! जैसे कोई विद्या या मंत्र के अधिष्ठायक देव उसके साधक की बुरी दशा कर देते है । उसी तरह यह स्त्री भी पुरुष की दुर्दशा करके कलंक उत्पन्न करवानेवाली होती है । पाप की हत्या के संकल्प करनेवाले को जिस तरह धर्म का स्पर्श नहीं होता वैसे उनका संकल्प करनेवाले को धर्म नहीं छूता । चारित्र में स्खलना हुई हो तो स्त्री के संकल्पवाले को आलोचना, निंदा, गर्हा प्रायश्चित्त् करने का अध्यवसाय नहीं होता । आलोचना आदि न करने की कारण से अनन्तकाल तक दुःख समूहवाले संसार में घुमना पड़ता है । प्रायश्चित् की विशुद्धि की होने के बावजूद भी फिर से उनके संसर्ग में आने से असंयम की प्रवृत्ति करनी पड़ती है । महापाप कर्म के ढ़ंग समान साक्षात् हिंसा पिशाचिणी समान, समग्र तीन लोक से नफरत पाई हुई । परलोक के बड़े नुकशान को न देखनेवाले, घोर अंधकार पूर्ण नरकावास समान हमेशा कई दुःख के निधान समान । स्त्री के अंग उपांग मर्म स्थान या उसका रूप लावण्य, उसकी मीठी बोली या कामराग की वृद्धि करनेवाला उसके दर्शन का अध्यवसाय भी न करना । [४०८] हे गौतम ! यह स्त्री प्रलय काल की रात की तरह जिस तरह हमेशा अज्ञान अंधकार से लिपीत है । बीजली की तरह पलभर में दिखते ही नष्ट होने के स्नेह स्वभाववाली होती है । शरण में आनेवाले का घात करनेवाले लोगों की तरह तत्काल जन्म दिए बच्चे के जीव का ही भक्षण करनेवाले समान महापाप करनेवाली स्त्री होती है, सजक पवन के योग से धुंधवाते उछलते लवणसमुद्र के लहर समान कई तरह के विकल्प-तरंग की श्रेणी की तरह जैसे एक स्थान में एक स्वामी के लिए स्थिर मन करके न रहनेवाली स्त्रीं होती है । स्वयंभुरमण समुद्र काफी गहरा होने से उसे अवगाहन करना अति कठिन होता है । वैसे स्त्रीीं के दिल अति छल से भरे होते है । जिससे उसके दिल को पहचानना काफी मुश्किल है । स्त्रीं पवन समान चंचल स्वभाववाली होती है, अग्नि की तरह सबका भक्षण करनेवाली, वायु की तरह सबको छूनेवाली स्त्रीं होती है, चोर की तरह पराई चीज पाने की लालसावाली होती है । कुत्ते को रोटी का टुकड़ा दे उतने वक्त दोस्त बन जाए । उसकी तरह जब तक उसे अर्थ दो तब तक मैत्री रखनेवाली यानि सर्वस्व हडप करनेवाली और फिर बैरिणी होती है । मत्स्य लहरों में इकट्ठे
SR No.009788
Book TitleAgam Sutra Hindi Anuvad Part 10
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherAgam Aradhana Kendra
Publication Year2001
Total Pages242
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, & Canon
File Size8 MB
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