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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra ६२ - www.kobatirth.org पद्म. - २४६ क्कंतियमणुस्स आहारयसरीरे अपमत्तसंजय सम्मद्दिद्विपत्तय संखेजवासाउय-कम्मभूमग गव्भवक्कंतियमणुस्सुआहारयसरीरे गोयमा पपत्तसंजय सम्मद्दिट्ठिपजत्तय संखेन्जवासाउय- कम्पभूमग - गब्भवक्कंतियमणुस्स आहारयसरीरे नो अपपत्तसंजय सम्मद्दिद्विपजत्तयसंखेज्जवासाज्य-कम्पभूमग गभवक्कंतियमणुस्साहारयसरीरे जइ पमत्तसंजय - सम्मद्दिट्टि पज्जत्तय - संखेज्जवासाज्य - कम्पङ्कमग गभवक्कंतियमणुस्स आहारयसरीरे किंइड्ढि पत्तपमत्तसंजय सम्मद्दिट्टि पञत्तय संखेज्जवासाउय कम्पभूमग - गन्भवक्कतियमणुस्स आहार यसरीरे अणिड्डिपत्त- पमत्तसंजय सम्मद्दिट्ठि-पजत्तय संखेज्जवासाउय-कम्मभूमग-गद्भवक्कंतियमणुस्स आहारयसरीरे गोयमा इड्ढिपत्त प्रमत्तसंजय - सम्मद्दिट्ठी - पञ्चत्तय संखेजवासाउय-कम्पभूमग-गढ्भवक्कंत्तियमणुस्स आहारयसरीरे नो अणिपित्त-पपत्तसंजय सम्मद्दिङ्गिपज्जत्तय संखेन्जवासाउय - कम्पभूमग-गब्भवक्कंतियमणुस्स आहारयसरीरे आहारचसरीरे णं भंते किं संठिए पत्ते गोयमा समचउरंससंठाणसंठिए पत्ते आहारयसरीरस्स केमहालिया सरीरोगाहणा पत्रत्ता गोयमा जहणणेणं देसूणा रवणी उक्कोसेणं पडिपुण्णा रयणी तेयासरीरे णं भंते कतिविहे पत्ते गोयमा पंचविहे पत्रते एगिंदियतेयासरीरे य बेइंदियतेयारसरीरे य [तेइंदियतेयासरीरे य चउरिदियतेयासरीरे य पंचेदियतेयासरीरे य एवं जावंगेवेजस्स णं भंते देवस्स मारणंतियसमुग्धातेणं समोहयस्स तेबासरीरस्स केमहालिया सरीरो गाहणा पन्नता गोयमा सरीरप्पमाणमेत्ती विक्खंभबाहल्लेणं आवामेणं जहनेणं अहे जाव विजाहरसेढीओ उक्कोसेणं अहे जाय अहोलोइया गामा तिरियं जाव मणुस्स खेत्तं उडूढं जाव सवाई विमाणाई एवं अनुत्तरोववाइया वि एवं कम्पयसरीरं पि भाणियव्वं १५२/- 152 ( २४७ ) कइविहे णं भंते ओही पनते गोयमा दुविहे पत्ते भवपनाइए य खओवसमिए य एवं सव्वं ओहिपदं भाणियच्चं 19५३-११-153-1 (२४८) सीता य दव्य सारीर साय तह वेयणा भवे दुचखा अवगमुक्कमिया निदाए चेव अणिदाए ॥७३॥-1 (२४९) नेरइया णं भंते किं सीतवेवणं वेदंति उसिणवेयणं वेदंति सीतोसिणं वेयणं वेदति गोयमा नेरइया [ सीतं वि वेदणं वेदेतिं उसिणं पि वेदणं वेदेति नो सीतोसिणं वेदणं वेदेति ] एवं चैव वेयणापदं भाणियच्चं कइ णं भंते लेसाओ पत्रत्ताओं गोयमा छ लेसाओ पत्रत्ताओ तं जहा - किण्हलेस्सा नीललेसा काउलेसा तेउलेसा पम्हलेसा सुक्कलेसा एवं सापयं भाणिव्यं । १५३-२1-153-2 ( २५० ) अंतरा य आहारे आहाराभोगणाऽवि व - - - Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir - समयाओ A For Private And Personal Use Only → पोला नेव जाणंति अज्झबसाणा य सम्मत्ते ॥७४॥-1 (२५१ ) नेरइया णं भंते अनंतराहारा तओ निव्वत्तणया तओ परियाइयणया तओ परिणामणया तओ परियारणया तओ पच्छा विकुव्वणया हंता गोयमा नेरइया णं अनंतराहारा तओ निव्वत्तणया ततो परिवाइयणया तओ परिणामणया तओ परियारणया तओ पच्छा विकुव्वणया एवं आहारपदं भाणियव्वं । १५३/- 153 (२५२) कइविहे णं भंते आउगबंधे पत्रत्ते गोयमा छविहे आउगबंधे पन्नत्ते तं जहाजाइनामनिधत्ताउके गतिनामनिधत्ताउके ठिइनामनिधत्ताउके पएसनामनिधत्ताउके अनु
SR No.009730
Book TitleAgam 04 Samavao Angsutt 04 Moolam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherAgam Shrut Prakashan
Publication Year1996
Total Pages82
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 04, & agam_samvayang
File Size2 MB
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