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________________ दिगंबर अने श्वेतांबर बने शास्त्रोमा आपेलो छ अने ते प्रमाणे केटलीक रीते ते पळातो पण आन्यो छे. त्यारे हवे आ लेखो तरफ जोहए छीए तो नं. २ जानो जे लेख छे तेमां तो स्वास स्पष्ट लखवामां आव्यु छे के खारवेलनी पटराणीए कलिंगना निग्रंथ श्रमणोना निवास माटे आ लयन कराव्युं छे. ऐतिहासिक दृष्टिए आ वात अवश्य विचारवा जेवी छे. दिगंबर अने श्वेतांबर बने संप्रदायना जैनग्रंथो जोतां जणाय छे के प्राचीनकालमां जैनमुनिओ घणा भागे. निर्जन स्थानोमा ज वास करता हता. शीतकाळ अने उष्णकाळना समयमां तो तेओ वृक्षोना आश्रय नीचे रहीने पण पोताना संयमनो निर्वाह करी शकता होय पण वर्षाकाळमां तो तेम निर्वाह थइ शके नहि अने तेटला माटे तेमने आवा पार्वतीय स्थानोना आश्रयनी अपेक्षा अवश्य रहेती ज होवी जोइए. हवे आवा पार्वतीय स्थानो तो दरेक ठेकाणे काइ नैसर्गिक रीते ज बनेला -हाथीगुफा जेवा-नहि होह शके, ते तो कोइना ने कोइना बनावेलां न म्होटे भागे होइ शके छे. अने आवां स्थानो केवळ श्रमणो-साधुओ शिवाय बीजा कोइने माटे बनाववानी आवश्यकता होय नहि तेथी आवा स्थानोमां ज जो पूर्व साधुओ वसता होय तो तो ते तेमना निमित्ते ज बनेलां होवां जोइए, अने तेमां ज साधुओ पोतानो संयम-निर्वाह करता होवा जोइए. तो पछी आवी स्थितिमां शास्त्रोक्त वसतिदोषनो परिहार शी रीते थइ शके छ ? विज्ञजनोए आ वात खास विचारवा जेवी छे. ५. आ लेख उपरथी छेल्ली जे विचारवा जेपी बाबत छे, ते मूर्ति पूजा विषयक छे. जैन श्वेतांबर संप्रदायनी एक शाला के जे ' स्थानकवासी' के ' टुंढिआ ' ना नामथी ओळखाय छे, ते शाखावाळा मूर्तिपूजानो स्वीकार नथी करता. तेमनुं कथन छे के जैनधर्ममा जे मूर्ति "Aho Shrut Gyanam"
SR No.009685
Book TitlePrachin Jain Lekh Sangraha Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinvijay
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1917
Total Pages124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & History
File Size4 MB
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