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________________ ( १३ ) इन भंडारों के कुछ संग्रहों का विवरण 'जेललनेर भाण्डावारीय ग्रन्थानां सूवो' में प्रकाशित हुए हैं। इनमें से " कई मंडारों के निरीक्षण करने का मुझे अत्रवर मिला था। बड़े भंडार में बड़े २ ताड़पत्र के ग्रन्थ पत्थर के बजे कोठों में सुरक्षित है, तथा कुछ न म हो गये हैं । अयावधि वहां विनलिखित भंडार मौजूद है : :— ( १ ) बृहत् भण्डार - किले पर श्रीनाथजी के मंदिर के तल भूमि में है । (२) तपगलोय भण्डार - सहर के रूप गच्छ के उपासरे में है । ( ३ ) आचार्यगच्छीय भण्डार - सहर के आचार्य गच्छ के उपासरे में है । ( ४ ) ( ५ ) लुपगच्छाय भण्डार सहर के लौंका गच्छ के उपासरे में है । ( ६ ) यति गरजों का संग्रह- यह भण्डार सहर के उक्त यतिजी के उपासरे में है । (७) सेठ थोरूसाहजो का भण्डार- सहर में थीरूसाहजी की हवेली में है । बृहत् खररच्छ्रीय भण्डार - सहर के खरतर गच्छ के पड़े उपासरे में है । हाल में खरतरगच्छीय बाचार्य महाराज कृरामदसूरिजी के उपदेश और प्रेरणा से वहां के भंडारों के जीणोद्धार का कार्य आरम्भ हुआ है परन्तु द्रव्याभाव के कारण यह कार्य विशेष अग्रसर नहीं हो सका है। जिनने प्राचीन तीर्थमाला, स्तवन वहां के मंदिरों के विषय में कुछ परिवr देना भी आवश्यक है । देवने में आते हैं उन सत्रों में अधिकतया जैसलमेर का नाम मात्र उल्लेख मिलता है । स्वर्गीय उपगच्छावार्य विजयधर्मसूरियो संग्रहोत 'प्राचीन तीर्थमाला - संग्रह' प्रथम खंड में प्रकाशित तीर्थमालाओं के से में केवल जंकरे का नाम मात्र है ! बहुत जेसलमेर चैत्य परिगयो स्तनों में केवल जेसलमेर के किले पर के आठ मंदिरों के वर्णन मिलते हैं । सं० १७०१ में खरतरगच्छावार्य जिनमुखसूरिजी कृत जेसलमेर-- वेत्यपरिपाटी में आठ मंदिरों को वर्णना के साथ उन सबों के सूर्तियों की संख्या भी हैं और यह परिपाटी उक्त तीर्थमाला संग्रह पृ० १४६ में छपी है । सं० १७०८ में महिमासमुद्रो कृत जैसलमेर चेत्य परिपाटी स्तान में भी उक्त आठ मंदिरों के उल्लेख हैं । इन्हें उपयोगी समय र परिशिष्ट में प्रकाशित किये गये । इन सब मंदिरों में कोई आधुनिक परिवर्तन तो देखने में नहीं आये परतु चाहे ओर किसी स्थान से आई हुई हों चाहे और कोई कारण से हो मंदिरों की मूर्ति संख्या वर्तमान में आगे से कुछ अधिक हुई हैं । वहां के कई मंदिरों में मूर्ति संख्या अधिक होने के कारण कुछ मायें भूमि पर भी विराजमान देखने में आये । अवस्थित मूर्तियां वेशे पर विराजमान किये गये है इनमें से कुछ वर्ष पहले श्रीआदिनाथजो के मंदिर की जिनका विवरण लेख नं० २५६२ में पाठकों को मिलेंगे । * (१) सं० १६६३ में शांतिकुराउजो विवित गोड़ो पार्श्वनाथ स्तवन' ( पृ० १६६ ), ( २ ) सं० १७१७ में विजयसागरजी कृत 'समेत शिखर तोर्थमाला' ( पृ० १२ ), ( ३ ) सं० १७२१ में मेवविजयजी कृत 'पार्श्वनाथ नाममाला' ( पृ० १५२ ) ( ४ ) सं० १७४६ में शोलविजयजो विचित 'तीर्थमाला' ( पृ० १०७ ), ( ५ ) सं १७०० में सौभाग्यविजयजी कृत 'तीर्थमाला' ( पृ० ६७ ) । H "Aho Shrut Gyanam"
SR No.009680
Book TitleJain Lekh Sangraha Part 3
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPuranchand Nahar
PublisherPuranchand Nahar
Publication Year
Total Pages374
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & History
File Size20 MB
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