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________________ नेपघमहाकाव्यम् वृहस्पतिः तथा प्रगल्भ इत्यर्थः । 'सूनृतं च प्रिये सत्यमित्यमरः । स नृपतिरितीत्थं हंसं विसृज्य श्रुतिलग्नः श्रोत्रप्रविष्टः कलहंसस्य शंसितैर्विस्मितः सन् वनवेश्म भोगगृहमविशत् ॥ ६३ ॥ ५२ अन्वयः--धैर्यवान् सूनृतवाग्वृहस्पतिः सः नृपतिः इति तं विसृज्य श्रुतिलग्नैः कलहंसशंसितैः विस्मितः वनवेश्म अविशत् । हिन्दी - - धैर्यशाली, सत्य और प्रिय वाणी बोलने में वृहस्पतिसम प्रगल्म वह नरराज इतना कह हंस को भेज कर कानों में लगे ( प्रिय होने के कारण अविस्मरणीय ) सुन्दर हंस के कहे हुए ( अथवा हंस के रमणीय अथवा गंभीर वचनों ) पर विस्मित होता वाटिका गृह में प्रविष्ट हो गया । टिप्पणी- - नल के धैर्य, सत्यवादिता और प्रियवादिता का विवरण । राजा ने हस को कार्य - साधनार्थ भेजकर वाटिका में ही उसके लौट आने तक प्रतीक्षा करने का निर्णय लिया । विद्याधर के अनुसार दीपक और अतिशयोक्ति । चंद्रकलाकार के अनुसार 'सूनृतवाग्बृहस्पतिः' में लुप्तोपमा ॥ ६३ ॥ अथ भीमसुतावलोकनः सफलं कर्त्तुं महस्तदेव सः । क्षितिमण्डलमण्डनायितं नगरं कुण्डिनमण्डजो ययौ ॥ ६४ ॥ जोवातु — अथेति । अथ सोऽण्डजो हंसः तदहरेव भीमसुतायाः भैम्या अवलोकनैः सफलं कर्तुं तस्मिन्नेव दिने तां द्रष्टुमित्यर्थः । क्षितिमण्डलस्य मण्डनायितमलंकारभूतं कुण्डिनं कुण्डिनाख्यनगरं ययौ ॥ ६४ ॥ अन्वयः—अथ सः अण्डजः तत् अहः एव भीमसुतावलोकन: सफलं कत्तु क्षितिमण्डलमण्डनायितं कुण्डिनं नगरं ययौ । हिन्दी - तत्पश्चात् वह पक्षी उसी दिन भीमतनया ( दमयंती ) के दर्शनों द्वारा (अपने को सफल करने के निमित्त पृथ्वीमण्डल के अलंकार बने कुंडिनपुर की ओर चल दिया । टिप्पणी - कुंडिन नगर समृद्धि के कारण तो रमणीय था ही, दमयंती के कारण वह पृथ्वीमण्डल का शृंगार बन गया था । अनुप्रास और उपमः अलंकार ।। ६४ ।
SR No.009566
Book TitleNaishadhiya Charitam
Original Sutra AuthorHarsh Mahakavi
AuthorSanadhya Shastri
PublisherKrishnadas Academy Varanasi
Publication Year
Total Pages284
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size74 MB
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