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________________ (२०) लग्नपुण्यपती द्वौ तु पुरा परस्परम् । परागमनकर्ता वन्यथाप्यन्यथा फलम् ||४६२ ॥ पुण्यलग्नेश संबद्धौ चन्द्रलग्नेश्वरौ यदि । द्विपदागम कर्तारावन्यग्रहयुतौ नहि ||४६३ ॥ सौरिर्जीवोऽथवा लग्ने स्थिरे यदि च सयुतः । रिपुरेति तदा नैव रिपुरेति चरैः पुनः ||४६४ || अर्काधिशुक्राणामेकों स्याच्चरोदये । भवेतदागमः शत्रोः स्थिरलग्ने न चागमः ॥४६५॥ 2 द्वितीये च तृतीये च गुरोः क्षेत्रेऽथवा भृगुः । बली यदा तदायाति शत्रुस्तत्र बलैर्युतः ॥४६६ || 3 मेश और धर्मेश की पारस्परिक दृष्टि हो अथवा वे दोनों युक्त ग्रह हों तो शत्रु का आक्रमण अवश्य होता है, अन्यथा रहें तो शत्रु नहीं आते ।। ४६२ ॥ लमेश और चन्द्रमा यदि पुण्यस्थानेश से संबन्ध रखते हों तो शत्रु का आगमन होता है, अन्यग्रहों के साथ युक्त होवें तो शत्रु नहीं आता ।। ४६३ । शनि अथवा गुरु यदि लग्न में रहें अथवा स्थिर राशि के हों तो शत्रु नहीं आता और यदि वे चर राशि के हों तो शत्रु श्राजाता है ||४||६४ रवि, शनि, बुध, शुक्र इनमें से कोई भी चर लग्न में रहे तो शत्रु का आगमन अवश्य रहे किन्तु स्थिर लग्न होने पर नहीं होता ।। ४६५ । 'बली शुक्र यदि द्वितीय, तृतीय अथवा गुरु की राशि में रहें तो शत्रु सेना के साथ आता है ।। ४६६ ।। 1. च नागम: for नचागम: A. 2. गुरुक्षेत्रे for गुरोः क्षेत्रे A. 3. For this line the ms reads बली यदा तदायाति शुको वा धिषणोऽपि वा । तथा तथा समायाति शत्रुस्तत्र बलैर्युत.
SR No.009389
Book TitleTrailokya Prakash
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHemprabhsuri
PublisherIndian House
Publication Year1946
Total Pages265
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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