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________________ 9.अ.शनि-पर्वत पर क्रास के साथ-2 शुक्र-पर्वत पर भी क्रास का चिन्ह-सुखांत प्रेम। 9.ब.शुक्र-पर्वत के अंगूठे के दूसरे पर्व के बहुत समीप नक्षत्र-विवाह अथवा 'अवैध प्रेम सम्बन्ध' जो व्यक्ति की सारा जीवन दुःखमय बनाये रखेगा। 9.स.जीवन रेखा अंगूठे के पास स्थिर विशेषकर यदि स्वास्थ्य तथा मस्तिष्क रेखायें नक्षत्र द्वारा जुड़ी हुई हों-सन्तानोत्पत्ति की अक्षमता। 10.अ.जीवन रेखा से मंगल पर्वत (बृहस्पति के नीचे) को जा रही किरण-युवावस्था के प्रतिकूल प्रेम जो कष्ट देवे। 10.ब.शुक्र पर्वत अथवा जीवन रेखा से किसी प्रमुख रेखा को द्वीप के साथ उपर्युक्त रेखा चाहे मध्यम हो-यह कष्ट तलाक देनेवाले व्यक्ति को गत जीवन में हुआ होगा। 10.स.मणिबन्ध- पहला वलय कलाई में ऊँचा और बीच में काफी उभरा हुआ- जनन क्रियाओं में कष्ट विशेषकर सन्तानोत्पत्ति में। 11.अ.हृदय रेखा अपनी सामान्य स्थिति से नीचे स्थित भावहीनता । 11.ब.हृदय रेखा जितनी लम्बी तथा बृहस्पति पर्वत में जितनी दूर तक यह हो-उतना ही स्थिर और आदर्श प्रेम। 141
SR No.009372
Book TitleSaral Hastrekha Shastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRameshwardas Mishr, Arunkumar Bansal
PublisherAkhil Bhartiya Jyotish Samstha Sangh
Publication Year2001
Total Pages193
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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