SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 315
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ कल्पसूत्रे सशब्दार्थे ॥२९९ ॥ प्रकार के तप की आराधना से आत्मा को भावित करते हुए विचरते थे । भगवान् ने अत्यधिक शीत पडने पर भी, शीत निवारण के लिए पराये वस्त्र को कभी धारण नहीं किया, तथा गृहस्थ के पात्र में भोजन नहीं किया । आहार और पानी के परिमाण को जानने वाले भगवान् मधुर आदि रसों में वृद्धि से सर्वथा रहित थे । इहलोक और परलोक संबंधी प्रतिज्ञा से रहित थे; अर्थात् उन्हें न इस लोक संबंधी कोइ कामना थी, न परलोक संबंधी ही । वे सर्वथा कर्म निर्जरा की भावना से उग्र तप संयम की आराधना करने में तत्पर थे । उन्होंने नेत्रों को भी कभी जल से साफ नहीं किया । खुजली आने पर भी शरीर को नहीं खुजलाया । जनपद विहार करते हुए भगवान् ने कभी तिरछा - इधर-उधर, या पिछे की तरफ नहीं देखा । सामने की तरफ शरीर परिमित- साढ़े तीन हाथ भूमि - मार्ग को देखते हुए विहार करते थे । शीत काल में अपनी दोनों भुजाएँ । फैलाकर संयम में आत्मबल का प्रयोग करते थे, कंधो पर भगवतोऽ नार्यदेशसंजातपरीपोपसर्ग वर्णनम् ॥ २९९ ॥
SR No.009361
Book TitleKalpsutram Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1973
Total Pages912
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_kalpsutra
File Size49 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy