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________________ सुबोधिनी टीका. ९६ सुर्याभदेवस्य सूधर्मसभाप्रवेशादिनिरूपणम् ६९९ तद्यथा-पौरस्त्ये चत्तस्रः साहरू यः, दक्षिणे चतस्त्रः साहस्यः, पाश्चात्ये चतस्त्रः साहस्यः, उत्तरे चतसः साहन यः। ते खलु आत्मरक्षदेवाः सन्नवद्ध धर्मितकरचाः उत्पीडितशरासनपट्टिकाः पिनद्धग्रेवेयाः आविद्धविमलवरचिह्नपहाः गृहीतायुध. प्रहरणाः त्रिनतानि त्रिसन्धिकानि वज्रमयकोटोनि भपि प्रगृह्य पर्यात काण्डकलापा नीलपाणयः पीतपाणयः रक्तपाणयः चापपाणधः चारूपाणयः बैठे गये. (तं जहा-पुरथिमेण चत्तारि शाहस्सीओ दाहिणेण चत्तारि साहस्सीओ, पच्चत्थिमेण चत्तारिसाहस्सीओ उत्तरेण चत्तारि साहस्सीओ) जैसे-पूर्व दिशा में चारहजार, दक्षिणदिश में चार हजार, पश्चिम दिशामें चारहजार और उत्तरदिशा में चारहजार (तेणं आयरक्खदेवा सन्नद्धबद्धवम्मियकथया, उष्पीलियसरासणपट्टिया, पिणद्वगेविजा, अविद्धविमलवरचिंघपट्टा' गहियालहपहरणा) ये सब आत्मरक्षक देव गाढतर बडू ऐसे मधय से जो कि अगरक्षा के लिये अच्छी तरह से पहिरा गया था. युक्त थे, प्रत्यंचा के चढाने से धनुदंड इनका विनना था अर्थात् धनुष इनका चढ़ा हुआ था, अथवा धनुष को इन्होंने अपने कंधों पर रख छोडा था, सबने ग्रीवा में अलंकार पहिरा हुआ था. जिन निर्मलबस्त्रो को इन्होंने पहिरा था वे वस्त्र इनके श्रेष्ठचिहों से युक्त थे. सबने अपने हाथों में धनुष आदि अलों कों और खङ्गादिक शत्रों को ले रखा था (तिणयाणि तिसंधियाई चयरामय कोडीणि धणई पमिज्म पडियाइयकंडकलोवा) आदि. मध्य एवं अवसानरूप मात्मरक्ष देवो, ११ १२ मद्रासने। ५२ मेसी गया. (त' जहा-पुरस्थिमेण यत्तारि साहस्सीओ, दाहिणेण चन्तारि साहस्सीओ पञ्चस्थिमेण' चत्तारि साहस्सीओ उत्तरेणं चत्तारि साहस्सीओ) पूर्व शिाम या हुन२, ६क्षिण दिशामा यार कर पश्चिम दिशामा यार ०२ अने. उत्त२ हिम या२ २ (नेणं थायरक्खदेवा सन्नाबदवम्मियकाया. उप्पीलियसरासणपट्टिया. पिणद्ध विज्जा आविद्ध विमलवर चिंधपटा गहियाउहपहरगा) PAL मात्मरक्ष हे त२१ मेवा કવાથી-કે જે અંગરક્ષણ માટે સારી રીતે પહેરવામાં આવ્યાં હતાં–સુસજિત હતા. પ્રત્યંચા ચઢાવેલી હેવાથી એમના ધનું વિનમ્ર હતા એટલે કે એમના ધનુષ ચઢાવેલાં હતાં. અથવા તે તેમણે પોતાના ખભા પર ઘgષે પહેરી રાખ્યાં હતાં. ગળાંમાં બધાએ અલંકારો પહેરી રાખ્યા હતા. તેમના ધારણ કરેલાં વસ્ત્રો શ્રેષ્ઠ ચિન્હાથી યુક્ત હતાં. તેઓ બધા પિતાના હાથમાં धनुष पोरे पो मने म बोरे खाने धारण ४ी राज्य si. (तिणयाणि तिसंधियाई चयरामघकोडीणि धणूई पगिज्य पडियाइयकंटकलावा) આદિ, મધ્ય અને અવસાનરૂપ ત્રણે સ્થાનોમાં નત-નપ્રીભૂત, તેમજ આ ત્રણે સ્થાનોમાં
SR No.009342
Book TitleRajprashniya Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1965
Total Pages721
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_rajprashniya
File Size55 MB
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