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________________ ५१० राजप्रश्नोयसूत्रे विशिष्टा अनेकारपञ्चवर्णकुटभीसहस्रपरिमण्डिताभिरामाः वांतोबूतविजय वैजयन्ती पताकाः छत्रातिच्छत्रकलिताः तुड़ा गगनतलाभिल मानशिखराः पासादीयाः ४। तेषां खलु महेन्द्रध्वजानामुपरि अण्टाप्ट मङ्गलकानि, ध्वजाः, छनोतिच्छन्त्राणि । तेषां खलु महेन्द्रध्वजानी पुरतः प्रत्येकं प्रत्येकं नन्दा Uणकुडभिसहस्सपरिमंडियाभिरामा) महेन्द्रध्वजाए प्रत्येक साठर योजन की ऊंची हैं, इनका उध एक योजन का है. एक योजन का इनका विस्तार है. से लय महेन्द्र ध्वजाएं वज्ररत्न की बनी हुई है. इनका वृन-गोल है, और मनोज्ञ है. ये सब सुसंबद्ध हैं, खरशाण) से घिसे गये पाषाण खण्ड की तरह थे प्रनीत होती हैं. सुकुमारशाण से चिकने किये गये प्रस्तरखण्ड की बरह ये मालूम पडती हैं ये अपने स्थान से जरा सी भी नहीं चल सकती है, अतः सुस्थिर हैं. अन्य ध्वजाओं की अपेक्षा ये सब धनश्रेष्ठ हैं 2 लग अन्य और छोटी२ पांचवों की सहस्रपताकाओं से मुशोभिन है, अतएव (विलिट्ठा) अभिराम-मनोज्ञ है (वाउद्धयविजयवेजयंति पडागा छत्ताहच्छत्तकलिया, तुंगा, गगणतलमभिलंघमाण सिहरा, पासाईया. ४) वायु से कापित वडीर और ध्वजाएं एवं लघुध्वजाए. इनमें हैं छत्रोपरिस्थाप्यमान छत्रों से थे युक्त हैं, उच्च हैं अतएव इनकी शिखरें-अग्रभाग-आकाशतल को उल्लंघन करती हुई के समान प्रतीत होती हैं, इस तरह ये सब जोयणं उन्वेहेणं, जोयण विखंभेणं वइरामय-वल?-संठिय-सुसिलिट्ठ परिघट्टमहसुपइट्ठिया विसिट्ठा अणेगवर पंचवण्णकुडभिसहस्सपरिमंडियाभिरामा) આ મહેન્દ્રધ્વજાઓથી દરેકે દરેક મહેન્દ્રધ્વજા ૬૦ જન જેટલી ઊચી છે. એમને ઉદ્વેધ એક જન જેટલું છે અને વિસ્તાર પણ એક એજનનો છે. આ બધી મહેન્દ્રધ્વજાએ વજીરત્નની બનેલી છે. એમને આકાર વૃત્ત-ગોળ છે અને મનેણ છે. એ બધી સુસંબદ્ધ છે. એઓ પથ્થરને લીસા કરવાના યંત્રથી ઘસીને લીસા બનાવેલા પાષાણખંડની જેમ લાગે છે. યંત્રથી લીસા બનાવેલા પ્રસ્તરખંડની જેમ તે સરસ લાગે છે. એ પિતાના સ્થાન પરથી સહેજ પણ ખસી શકતી નથી. એટલા માટે સુસ્થિર છે. બીજી ધ્વજાઓ કરતાં આ ધ્વજાઓ શ્રેષ્ઠ છે. આ બધા જે બીજી નાની નાની पांयवाणी सहुलयतामाथी सुशामित २ मेट। भाट (विसिट्टा) मलिरामभनाई छ. (वाउद्धयविजयवेजयंतीपडागाछत्ताइच्छत्तकलिया, तुंगा, गगणतलमभिलंघमाणसिहरा, पासाईया४) समनामा पवनडे ४पित थती माटी મટી અન્ય દવાઓ અને લઘુષ્યજાઓ છે. એઓ છત્રપરિસ્થાપ્યમાન છત્રોથી યુક્ત छ, Bथ्य छ, मेथी समना ! शमश-मयमागो-मासने मोजता दागे छ.
SR No.009342
Book TitleRajprashniya Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1965
Total Pages721
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_rajprashniya
File Size55 MB
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