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________________ हम्मीरमहाकाव्य : नयचन्द्रसूरि २७१ ऊज़ क्दिारितमरातिना शिरो भ्रश्यन्नियोजितमपि द्विधाऽप्यधः। स्वेनैव भिन्नजठरादुपादतरन्त्रनिक्ष्या युयुधे पुनर्भटः ॥ १२.४५ एकः करी समरसीम्नि सादिनं चिक्षेप कन्दुकमिवाधिपुष्करम् । धृत्वा करेण च कटौ परो हयं प्रास्फालयद् रजकवस्त्रवद् भुवि ॥ १२.७२ हम्मीरमहाकाव्य में अन्यत्र भी वीररस के चित्र सुंदर तथा प्रभावोत्पादक हैं। नयचन्द्र की कल्पनाशीलता तथा गम्भीर पदावली उनके सौन्दर्य को और बढ़ा देती है। दीक्षित वासुदेव के शौर्य का प्रस्तुत चित्र उक्त गुणों के कारण विशेष उल्लेखनीय है । "जब नट नर्तकी को नचाता है तो अनेक प्रकार के वाद्य बजते हैं और प्रेक्षक अपने अपने स्थान पर बैठ कर नृत्य का आनन्द लेते हैं । वासुदेव ने अपनी चक्कर लगाती हुई तलवार के बहाने जब शौर्यश्री रूपी नर्तकी को रण-रंगभूमि में नचाया, उस समय उसी तरह चारों तरफ जुझाऊ बाजे बज रहे थे और देवता लोग आकाश से इस विचित्र नृत्य का प्रेक्षण कर रहे थे।" इस गूढोपमा ने वर्णन में नयी आभा डाल दी है। प्रवाद्यमाने रणवाद्यवृन्दे संपश्यमानेषु दिवः सुरेषु । शौर्यश्रियं यो रणरंगभूमावनर्तयद्वेल्लदसिच्छलेन ॥ १.३० परन्तु नयचंद्र की मूलवृत्ति अहिंसावादी है । युद्ध तथा तज्जन्य हिंसा से उसे सहज घृणा थी । 'म पुष्परपि प्रहर्त्तव्यविधिविधेय:' (१२.८३)-उसके अर्न्तमन की भावना को बिम्बित करता है। शृंगाररस के चित्रण में नयचन्द्र कदाचित् वीररस से भी अधिक सिद्धहस्त हैं। वीररस-प्रधान काव्य में, पूरे तीन सर्गों में, शृंगार का सविस्तार वर्णन मात्र साहित्यिक आदर्श की पूर्ति नहीं है, वह श्रृंगार के प्रति उनके आन्तरिक अनुराग का द्योतक है । वीररसात्मक रूढियों के समान शृंगार की व्यंजना करने में नयचन्द्र ने माघ का अनुसरण किया है। माघ के समान ही हम्मीरमहाकाव्य का श्रृंगार वासनामय तथा ऐन्द्रिय है । नयचंद्र ने वाच्य-प्रणाली का आश्रय लेकर शृंगार का जो नग्न चित्रण किया है, उसने उनके शृंगार की सरसता को कुचल दिया है और वह अश्लील (कहीं-कहीं निर्लज्ज) बन गया है । नयचन्द्र ने गर्वपूर्वक विकत्थना की है कि जिसने हम्मीरमहाकाव्य के 'शृंगार-संजीवन' सप्तम सर्ग का आस्वादन नहीं किया, उसके लिये शृंगार के कामिनी-सहित समस्त उपकरण अकारथ हैं, किन्तु इसमें सम्भोग केलियों के अन्तर्गत बहुधा वीर्यपात, विपरीतरति, सम्भोगमुद्राओं आदि के द्वारा मर्यादाहीन अशिव भावोच्छ्वास हुआ है। इसलिए हम्मीरमहाकाव्य का शृंगार विलासवृत्ति (कामुकता) को अधिक उभारता है ! नयचन्द्र की नायिका की भाँति वह सौन्दर्य को उघाड़ कर क्षणिक गुदगुदी पैदाकर सकता है, उसमें हृदय के अन्तस्तल में पैठने की ४०. ... खिलमिदं न श्रुतः सप्तमश्चेत् । सर्गः शृंगारसंजीवन इति विदितो वीरहम्मीरकाव्ये ॥ वही, ७.१२८ ४१. गलदम्बरा क्षणमभादपरा प्रकटीभवन्त्यतनुशक्तिरित । वही, ५.६८
SR No.006165
Book TitleJain Sanskrit Mahakavya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSatyavrat
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1989
Total Pages510
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
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