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________________ २६ हरिवंशपुराणे जिनेन्द्र केवलज्ञानवैमल्यमनुकुर्वता । धनावरणमुक्तेन गगनेन विराजितम् ॥२६॥ नीरजोभिरहोरात्रं जनताभिरिवेश्वरः । आशाभिरपि नमल्यं बिभ्रतीभिरुपासितः ॥२७॥ धर्मदानं जिनेन्द्रस्य घोषयन्तः समन्ततः । आह्वानं चक्रिरेऽन्येषां देवा देवेन्द्र शासनात् ॥२८॥ सहस्रारं हसद्दीप्त्या सहस्रकिरणद्युति । धर्मचक्रं जिनस्याग्रे प्रस्थानास्थानयोरमात् ॥२९॥ इति देवकृतैर्भूमौ चतुर्दशभिरद्भुतैः । विजहार जिनो युक्तः सध्वजैरष्टमङ्गलैः ॥३०॥ अशोकनगमाभासीदशोकानोकह श्रिया । नमद्भुवनमाकाशं महत्त्वं किमतः परम् ॥३१॥ पुष्पवृष्टिभिरानम्रशिरोभिरमरैः करैः । आवर्जिताभिराकाशादाशीविश्वंभरा बनुः ॥३२।। चतुर्दिक्षु चतुःषष्टिचमरैरमरैर्जिनः । वीजितोऽभात् पतद्गाङ्गतरङ्गैर्हिमवानिव ॥३३॥ अभिभूयाबभौ धाम्ना मण्डलं चण्डरोचिषः । प्रभामण्डलमीशस्य प्रध्वस्ताहर्निशान्तरम् ॥३४॥ धीरमध्वनि देवानां जजम्भे दुन्दुमिध्वनिः । कर्मशत्रुजयं जैनं घोषयन्निव विष्टपे ॥३५।। एकातपत्रमैश्वयं भुवि मुक्तवतोऽहंतः । आतपत्रत्रयैश्वर्यमाबभौ भुवनत्रये ॥३६॥ सिंहासनं नरेन्द्रौघैर्वृतं त्यक्तवतो बमौ । सिंहासनं जिनस्यान्यत्सुरेन्द्र परिवारितम् ॥३७॥ धर्मोकी योजनव्यापी चेतःकर्णरसायनम् । दिव्यध्वनिर्जिनेन्द्रस्य पुनाति स्म जगत्त्रयम् ॥३८॥ हर्षसे उसके रोमांच ही निकल आये हों ।।२५।। मेघोंके आवरणसे रहित आकाश ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो वह जिनेन्द्रदेवके केवलज्ञानकी निर्मलताका ही अनुकरण कर रहा हो।२६।। जिस प्रकार रजोधर्मसे रहित होनेके कारण निर्मलता-शुद्धताको धारण करनेवाली स्त्रियाँ रात-दिन अपने पतिकी उपासना करती हैं उसी प्रकार रज अर्थात् धूलिसे रहित होनेके कारण उज्ज्वलताको धारण करनेवाली दिशाएँ भगवान्की उपासना कर रही थीं ॥२७॥ इन्द्रकी आज्ञासे देव लोग, सब ओर जिनेन्द्रदेवके धर्मदानकी घोषणा करते हुए अन्य लोगोंको बुला रहे थे ॥२८॥ विहार करते हों चाहे खड़े हों प्रत्येक दशामें श्रीजिनेन्द्रके आगे, सूर्यके समान कान्तिवाला तथा अपनी दीप्तिसे हजार आरेवाले चक्रवर्तीके चक्ररत्नकी हंसी उड़ाता हुआ धर्मचक्र शोभायमान रहता था ॥२९।। इस प्रकार देवकृत चौदह अतिशयों और ध्वजाओं सहित अष्ट मंगल द्रव्योंसे युक्त श्रीमहावीर जिनेन्द्र पृथिवीपर विहार करते थे ॥३०॥ अष्ट प्रातिहार्योंमें प्रथम प्रातिहायं अशोकवृक्ष ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो अशोकवृक्षकी शोभाके बहाने समस्त संसार अथवा आकाश ही भगवान्को नमस्कार कर रहा हो इससे अधिक और महत्व क्या हो सकता है ? ॥३१॥ नम्रीभत शिरको धारण करनेवाले देव लोग अपने हाथोंसे जो पुष्प-वृष्टियाँ छोड़ रहे थे उनसे समस्त दिशाओंकी भूमियाँ सुशोभित हो रही थीं ॥३२।। चारों दिशाओं में देवों द्वारा चौंसठ चमरोंसे वीजित भगवान् उस प्रकार सुशोभित हो रहे थे जिस प्रकार कि पड़ती हुई गंगाकी तरंगोंसे हिमगिरि सुशोभित होता है ॥३३॥ जिसने रात-दिनका अन्तर दूर कर दिया था ऐसा भगवान्का भामण्डल, अपने तेजसे सूर्य मण्डलको अभिभूत करदबाकर सुशोभित हो रहा था ॥३४॥ देवोंके मार्ग अर्थात् आकाशमें दुन्दुभियोंका शब्द इस गम्भीरतासे फैल रहा था मानो वह संसारमें इस बातकी घोषणा ही कर रहा था कि श्रीजिनेन्द्रदेव कर्मरूपी शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर चुके हैं ॥३५॥ जिसमें एक छत्र लगाया जाता है ऐसे पृथिवीके ऐश्वर्यको त्याग करनेवाले भगवान्के छत्रत्रयसे युक्त तीन लोकका ऐश्वर्य प्राप्त हआ है ऐसा जान पडता था ॥३६॥ यतश्च भगवानने राजाओंके समहसे घिरा हुआ सिंहासन छोड़ दिया था इसलिए उन्हें इन्द्रोंसे घिरा हुआ दूसरा सिंहासन प्राप्त हुआ था ॥३७॥ जो धर्मका उपदेश देनेके लिए एक योजन तक फैल रही थी तथा जो चित्त और कानोंके लिए रसायनके १. दिशाभिः । २. सूर्यसमान-कान्तियुक्तम् । ३. शोकानोकुहश्रिया-क., ख., ग. । ४. पातिताभिः । ५. आशा दिशा एव विश्वम्भराः पृथिव्यस्ताः । ६. सूर्यस्य । ७. धोरं । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org Jain Education International
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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