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________________ तृतीयः सर्गः कुलकम् ] 1 "स्यक्तभुक्ति जरातीतमच्छायं छाययोर्जितम् । एकतो मुखमप्यच्छचतुर्मुखमनोहरम् ॥ ३३॥ द्वियोजनशतक्षोणी सुभिक्षत्वोपपादकम् । उपसर्गासुमत्पीडाव्यपोहं गगनायनम् ॥१४॥ सर्वंविद्यास्पदं कर्मक्षयोद्भूतदशाद्भुतम् । दृष्टं श्रुतं वपुर्जेनं व्यधत्त जगतः सुखम् ॥ १५॥ अमृतस्येव धारां तां माषां सर्वार्धमागधीम् । पिबन् कर्णपुटैजैनों ततर्प त्रिजगज्जनः ॥ १६ ॥ अन्योन्यगन्धमासोढुमक्षमाणामपि द्विषाम् | मैत्री बभूव सर्वत्र प्राणिनां धरणीतले ॥१७॥ व इवाज फलपुष्पानतद्रुमाः । सहैव षडपि प्राप्ता ऋतवस्तं सिषेविरे ॥ १८ ॥ स्वान्तः शुद्धिं जिनेशाय दर्शयन्तीव भूवधूः । सर्वरत्नमयी रेजे शुद्धादर्शतलोज्ज्वला ॥१९॥ जनिताङ्गसुखस्पर्शो ववौ विहरणानुगः । सेवामिव प्रकुर्वाणः श्रीवीरस्य समीरणः ॥२०॥ 'विहरत्युपकाराय जिने परमबान्धवे । बभूव परमानन्दः सर्वस्य जगतस्तदा ॥२१॥ देवा वायुकुमारास्ते योजनान्तर्धरातलम् । चक्रुः कण्टकपाषाणकोटकादिविवर्जितम् ॥ २२ ॥ तदनन्तरमेवोच्चैस्तनिताः स्तनिताभिधाः । कुमारा ववृषुर्मेधीभूता गन्धोदकं शुभम् ||२३|| पादपद्मं जिनेन्द्रस्य सप्तपद्मः पदे पदे । भुवेव नभसाऽगच्छदुद्गच्छद्भिः प्रपूजितम् ॥ २४ ॥ रेजे शाल्यादिसस्यौघैर्मेदिनी फलशालिभिः । जिनेन्द्रदर्शनानन्दप्रोद्भिन्न पुलकैरिव ॥२५॥ ৬ चारों ओर दिखाई देना, दो सौ योजन तककी पृथ्वी में सुभिक्ष होना, उपसर्गका अभाव, प्राणिपीड़ा अर्थात् अदयाका अभाव, आकाशगमन और सब विद्याओंका स्वामित्वपना, कर्मोके क्षयसे उत्पन्न हुए केवलज्ञानके इन दस अतिशयोंसे और भी अधिक आश्चर्यं उत्पन्न कर रहे थे । उस समय देखा अथवा सुना गया जिनेन्द्र भगवान्‌का शरीर जगत् के जीवोंको सुख उत्पन्न कर रहा था || १० - १५ ॥ सर्वभाषारूप परिणमन करनेवाली अमृतकी धाराके समान भगवान्‌की अर्द्धमागधी भाषाका कर्णंपुटोंसे पान करते हुए तीन लोकके जीव सन्तुष्ट हो गये ॥ १६ ॥ जो परस्परकी गन्ध सहन करने में भी असमर्थ थे ऐसे शत्रुरूप प्राणियोंमें पृथ्वीतलपर सर्वत्र गहरी मित्रता हो गयी ॥१७॥ जिनमें समस्त वृक्ष निरन्तर फल और फूलोंसे नम्रीभूत हो रहे थे ऐसी छहों ऋतुएँ 'मैं पहले पहुँचूँ, मैं पहले पहुँचूँ' इस भावनासे ही मानो एक साथ आकर उनकी सेवा कर रही थीं ॥ १८॥ सर्वरत्नमयी तथा निर्मल दर्पणतलके समान उज्ज्वल पृथ्वीरूपी स्त्री ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो जिनेन्द्र भगवान् के लिए अपने अन्तःकरणकी विशुद्धता ही दिखला रही हो ॥ १९ ॥ शरीरमें सुखकर स्पर्शं उत्पन्न करनेवाली विहारके अनुकूल - मन्द सुगन्धित वायु बह रही थी जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो भगवान्‌की सेवा ही कर रही हो ||२०|| उस समय परोपकार के लिए उत्कृष्ट बन्धुस्वरूप श्री जिनेन्द्र भगवान्‌के विहार करनेपर जगत् के समस्त जीवों को परम आनन्द हो रहा था || २१ || वायुकुमारके देव, एक योजनके भीतरकी पृथिवीको कण्टक, पाषाण तथा कीड़े-मकोड़े आदिसे रहित कर रहे थे ||२२|| उनके बाद ही जोरकी गर्जना करनेवाले स्तनितकुमार नामक देव मेघका रूप धारण कर शुभ सुगन्धित जलकी वर्षा कर रहे थे ||२३|| भगवान् पृथिवीके समान आकाशमार्गंसे चल रहे थे तथा उनके चरण-कमल पद-पदपर खिले हुए सात-सात कमलोंसे पूजित हो रहे थे । भावार्थ - विहार करते समय भगवान्‌के चरणकमलोंके आगे और पीछे सात-सात तथा चरणोंके नीचे एक इस प्रकार पन्द्रह कमलोंकी पन्द्रह श्रेणियाँ रची जाती थीं उनमें सब मिलाकर दो सौ पचीस कमल रहते थे ||२४|| फलोंसे सुशोभित शालि आदि धान्यों के समूहसे पृथिवी ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो जिनेन्द्र-दर्शन से उत्पन्न हुए १. कवलाहारादिरहितत्वम् । २. छायारहितम् । ३. छायया कान्त्या ऊर्जितम् । ४. गगन- गमनम् । ५. भाषासर्वार्ध-म. भाषां सर्वार्थ ख. । ६. परस्परगन्धमपि सोढुमसमर्थानां शत्रूणाम् । ७. अहं अग्रे गच्छामि अहम गच्छामीति भावनया युक्ता इव । ८. विहारं कुर्वति सति । ९. उच्चैर्गर्जनयुक्ताः । १०. मेघकुमाराः । For Private & Personal Use Only ४ Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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